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मजदूर ...

अनमोल है वो
जिसे दुनिया
मजदूर कहती है

इसी के बल से
धरातल पर
ऊंचाई रहती है

कहने को
मेरुदंड है वो
धरा के विकास का

आसमानों को छूती
अट्टालिकाएं बनाने वाला
जो
तिनकों की झोपड़ी में रहता है
वो
सृजनकर्ता
मजदूर कहलाता है

हर आज के बाद
जो
कल की चिंता में डूबा रहता है
कल का चूल्हा
जिसकी आँखों में
सदा धधकता रहता है
कम होती
रोटियों की गोलाई
जिसकी मजदूरी को
धिक्कारती है
भूख का तांडव
जिसके चेहरे पे
सदा नज़र आता है
सच
वो सृजनकर्ता 
मजदूर कहलाता है

उसकी समझ में नहीं आता
आखिर ये मजदूर दिवस
क्यों आता है ?
जीवन
जिस ढर्रे पर होता है
उसी पर चलता रहता है
धन और तन में
जंग होती रहती है
कलनी,कुल्हाड़ी,फावड़ा ,परात
यही तो उसकी जंग के साथी हैं
इन्हीं को वो अपनी व्यथा सुनाता है
इन्हीं के संग उठता है
इन्हीं के संग सो जाता है
कुछ भी तो नहीं बदलता
मजदूर दिवस पर भी
एक मजदूर
सिर्फ़
मजदूर ही कहलाता है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 512

Comment

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Comment by Sushil Sarna on May 5, 2018 at 2:46pm

आदरणीया बबितागुप्ता जी सृजन की गहनता को आत्मीय मान देने का दिल से शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on May 5, 2018 at 2:46pm

आदरणीय समर कबीर साहिब , आदाब ... आपकी ऊर्जावान प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ , हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on May 5, 2018 at 2:45pm

आदरणीया ममता जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से शुक्रिया।

Comment by babitagupta on May 5, 2018 at 12:28pm

आदरणीय सरजी,मजदूरों की दशा का सटीक शब्दों का वर्णन किया,साथ ही मजदूर दिवस पर अच्छा व्यंग किया,प्रस्तुत रचना पर बधाई स्वीकार कीजिएगा.

Comment by Samar kabeer on May 5, 2018 at 11:40am

जनाब सुशील सरना जी आदाब,मज़दूर दिवस पर बहुत उम्दा कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mamta on May 5, 2018 at 10:43am
आदरणीय सुशील जी बहुत सुंदर विचार सही ही तो है ..एक दिवस भी मज़दूरों को चैन नहीं ना उससे लाभ .. बहुत ठीक आंकलन .
सादर ममता

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