For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल

212 212 212 212

हो गईं इश्क में कैसी दुश्वारियां ।
हाथ आती गयीं सिर्फ बेचैनियां ।।1

क्यों हुई ही नहीं तुमसे नजदीकियां ।
हम समझने लगे थोड़ी बारीकियाँ ।।2

इस तरह मुझपे इल्जाम मत दीजिये ।
कब छुपीं आप से मेरी लाचारियां ।।3

उनकी तारीफ़ करती रहीं चाहतें ।
वो गिनाते रहे बस मेरी खामियां ।।4

दिल चुरा ले गई आपकी इक नजर ।
कर गए आप कैसे ये गुस्ताखियां ।5

दिल जलाने की साजिश से क्या फायदा ।
दे गया कोई जब आपको चूड़ियां ।।6

उन दरख्तों से मैं क्या शिकायत करूँ ।
जब लचकती रहीं बाग में टहनियां।।7

एक आई लहर सब उड़ा ले गयी ।
कुछ बचा ही नहीं प्यार के दरमियाँ ।।8

पार करने का जब हौसला ही न था ।
क्यों समंदर में उतरीं नईं कश्तियाँ ।।9

हिज्र के रास्ते पर चला था मगर ।
रुक गये यूँ कदम देखकर सिसकियाँ ।।10

हम घटाते रहे उम्र भर फासले ।
तुम बढाते गये बेसबब दूरियाँ ।।11

--- नवीन

मौलिक अप्रकाशित

Views: 448

Facebook

You Might Be Interested In ...

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 10, 2018 at 8:06am

आ0 कबीर सर सादर नमन । जी सर अभी बदलता हूँ ।

Comment by vijay nikore on May 9, 2018 at 8:50pm

गज़ल अच्छी कही है। मुबारक ।

Comment by Samar kabeer on May 9, 2018 at 3:16pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

हुस्न-ए-मतला में 'नजदीकियां-और बारीकियां,दोनों मिसरों में "कियाँ",एक मिसरे में क़ाफ़िया बदलें ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 9, 2018 at 1:15pm

भाई राम शिरोमणि जी यह मेरी पाठशाला यहाँ मैं कबीर सर निर्देशन में ग़ज़ल की ए बी सी डी सीखता हूँ ।

Comment by ram shiromani pathak on May 9, 2018 at 8:29am

सुंदर अशआर हुए है भाई।।आपको यहाँ देखकर प्रसन्नता हुई।।जय जय

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दोहे -रिश्ता
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी रिश्तों पर आधारित आपकी दोहावली बहुत सुंदर और सार्थक बन पड़ी है ।हार्दिक बधाई…"
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"तू ही वो वज़ह है (लघुकथा): "हैलो, अस्सलामुअलैकुम। ई़द मुबारक़। कैसी रही ई़द?" बड़े ने…"
Monday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"गोष्ठी का आग़ाज़ बेहतरीन मार्मिक लघुकथा से करने हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह…"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आपका हार्दिक आभार भाई लक्ष्मण धामी जी।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई।"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"ध्वनि लोग उसे  पूजते।चढ़ावे लाते।वह बस आशीष देता।चढ़ावे स्पर्श कर  इशारे करता।जींस,असबाब…"
Sunday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"स्वागतम"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अजय जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
Saturday

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service