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नदिया  पोखर सब सूखे - गजल ( लक्ष्मण धामी " मुसाफिर"

२२२२ २२२२ २२२२ २२२


पोथा पढ़ना पंडित  भूले  शुभ मंगल  में आग लगी
जो माथे को शीतल करता उस संदल में आग लगी।१।


जहर  भरा  है  खूब हवा  में  हर मौसम दमघोटू  है
पंछी अब क्या घर लौटेंगे जिस जंगल में आग लगी।२।


कैसी  नफरत  फैल  गयी  है  बस्ती  बस्ती  देखो तो
जिसकी छाँव तले सब खेले उस पीपल में आग लगी।३।


धन दौलत  की  यार पिपासा  इच्छाओं का कत्ल करे
चढ़ते यौवन जिसकी चाहत उस आँचल में आग लगी।४।


किस्मत फूटी है हलधर की नदिया  पोखर सब सूखे
कब देता है पानी जग को जिस बादल में आग लगी।५।


मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 13, 2018 at 6:25am

आ. भाई विजय जी, उपस्थिति से गजल का मान बढा़ने के लिए आभार ।

Comment by vijay nikore on June 12, 2018 at 9:51am

//कैसी  नफरत  फैल  गयी  है  बस्ती  बस्ती  देखो तो 
जिसकी छाँव तले सब खेले उस पीपल में आग लगी।३।//

वाह, वाह ! बहुत ही उम्दा गज़ल लिखी है। हार्दिक बधाई, लक्ष्मण जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 9, 2018 at 8:21pm

आ. भाई बृजेश जी, गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 9, 2018 at 2:43pm

वाह वाह आदरणीय क्या खूब ग़ज़ल कही वाह...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 8, 2018 at 1:06pm

आ. भाई गुमनाम जी, उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 8, 2018 at 9:45am

वाह क्या खूबसूरत आग लगाई ,,,,,वाह बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 8, 2018 at 7:50am

आ. भाई मोहित जी, गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 7, 2018 at 6:48pm

आ. भाई गंगाधर जी, उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on June 7, 2018 at 4:24pm

आदरणीय मुसाफिर साहब....उम्दा ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई......

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 7, 2018 at 1:34pm

आ. भाई तेजवीर जी, स्नेहिल उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद ।

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