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अम्बर को पाती भिजवाई -एक गीत

अम्बर को पाती भिजवाई,

व्याकुल होकर धरती ने.

 

सभी जरूरी संसाधन दे,

नर को जीना सिखलाया.

मर्यादा का पालन लेकिन,

कभी कहाँ वह कर पाया.

 

अपने मन की बात बताई,

व्याकुल होकर धरती ने.

 

पर्वत छीने, नदियाँ छीनी,

बरगद, पीपल छीन लिए.

नित्य अक्ष पर घूम रही हूँ,

अपनी देह मलीन लिए.

 

आसमान को व्यथा सुनाई,

व्याकुल होकर धरती ने.

 

चीरहरण की पीड़ा कब तक,

सहना मुझको बतला दो.

अंगारों पर चलूँ कहाँ तक,

इतना मुझको बतला दो.

 

अपनी जलती देह दिखाई,

व्याकुल होकर धरती ने.

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 5, 2018 at 1:28pm

 आदरणीय vijay nikore जी आपका दिल से शुक्रिया 

Comment by vijay nikore on June 4, 2018 at 2:06pm

सुन्दर गीत...आनन्द आ गया

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 4, 2018 at 1:15pm

आपका अतिशय आभार आदरणीया Neelam Upadhyaya जी 

Comment by Neelam Upadhyaya on June 4, 2018 at 11:56am

आदरणीय बसंत जी, सुंदर रचना की प्रस्तुति के बधाई स्वीकार करें । 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 4, 2018 at 10:15am

आपका अतिशय आभार आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 4, 2018 at 12:20am

आ. भाई बसंत जी, सुंदर गीत हुआ है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 3, 2018 at 10:45am

आपकी हौसलाअफजाई करती प्रतिक्रिया पर आपका बहुत बहुत धन्यवाद आदरनीय महेंद्र कुमार जी 

Comment by Mahendra Kumar on June 2, 2018 at 6:12pm

पर्यावरणीय दोहन पर बढ़िया गीत लिखा है आपने आदरणीय बसंत जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 2, 2018 at 12:35pm

आदरणीय  Mohammed Arif  जी आपका दिल से शुक्रिया, यूँ ही स्नेह बनाये रखें, सादर 

Comment by Mohammed Arif on June 2, 2018 at 10:59am

आदरणीय बसंत कुमार जी आदाब,

                         बरखा रानी की अच्छी आमद की मनोकामना से भरपूर प्यारे गीत की पेशकश पर हार्दिक बधाई ।

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