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2122 1212 22/112/211
कुछ नहीं सूझता कई दिन से
जाने क्या हो रहा कई दिन से?

है अलग ये जुबाँ निगाहें अलग
क्यों नहीं राबता कई दिन से।

हो लबों पे हँसी भले कितनी
मन रहा डगमगा कई दिन से।

जल रहा दिल कोई सही में कहीं
गर्म लगती हवा कई दिन से।

खुद पे खुद का नहीं रहा काबू
यूँ चढ़ा है नशा, कई दिन से।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on June 12, 2018 at 8:44pm

आदरणीय सतविंद्र कुमार जी आदाब,

                                बहुत बेहतरीन ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

                                  बहुत दिनों बाद हुजूर का पटल पर आना हुआ ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 12, 2018 at 5:13pm

बहुत खूब 

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 12, 2018 at 1:55pm

अच्छी ग़ज़ल कही है ....बधाई

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