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नसीहत को गिनिए नहीं धमकियों में - अरुण कुमार निगम

एक ग़ज़ल.......


122 122 122 122


नजर है तो पढ़िए गजल झुर्रियों में
ये चेहरा कभी है रहा सुर्खियों में।


वतन को सजाने के वादे किए थे
सदा आप उलझे रहे कुर्सियों में।


मसीहा समझ के था अगुवा बनाया
मगर आप भी ढल गए मूर्तियों में।


चढ़ाया हमीं ने उतारेंगे हम ही
पलक के झपकते, यूँ ही चुटकियों में।


अरुण के इशारे समझ लें समय है
नसीहत को गिनिए नहीं धमकियों में।।

(मौलिक व अप्रकाशित)☺

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Comment

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Comment by Ravi Shukla on August 6, 2018 at 11:51pm

आदरणीय  अरुण जी गजल के  लिए बघाई कुबूल करें  गुणी जन कह ही चुके हे बाकी बातें । सादर 

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 6, 2018 at 10:59pm

वाह निगम साहब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई । बधाई आपको ।

मगर आप भी खो गए जातियों में ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 6, 2018 at 9:58pm

जनाब अरुण कुमार साहिब, ग़ज़ल की अच्छी कोशिश है, मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l मुहतरम समर साहिब के मशवरे पर ग़ौर कीजियेगा I शेर 2 के सानी मिसरे में सदा की जगह मगर ज़्यादा सही लग रहा है , देखिएगा 

Comment by Samar kabeer on August 5, 2018 at 3:18pm

जनाब अरुण कुमार निगम जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'मगर आप भी ढल गए मूर्तियों में'

ये मिसरा लय में नहीं देखियेगा 'मूर्तियों'?

पलक के झपकते, यूँ ही चुटकियों में'

इस मिसरे में ऐब-ए- तनाफ़ुर है, देखें 'पलक के'

Comment by amod shrivastav (bindouri) on August 5, 2018 at 1:03pm

वाहःहः खूब

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