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दिख रहा इंसान है- ग़ज़ल

हर तरफ बस दिख रहा इंसान है
हाँ, मगर अपनों से वो अंजान है

थे कभी रिश्ते भी नाते भी मगर
आजतो यह सिर्फ इक सामान है

जिसको कहते थे कभी काबिल सभी
सबकी नज़रों में वो अब नादान है 

जिसको सौंपी थी हिफाज़त बाग़ की
बिक रहा उसका ही अब ईमान है 

हर तरफ बैठे शिकारी घात में
चंद लम्हों का वो अब मेहमान है

था कभी गुलज़ार जो शाम-ओ-सहर 
अब वही दिखने लगा शमशान है

जिसने देखे अम्न के सपने कभी
अब उसी का टूटता अरमान है 

जिसपे थे दंगों के छींटे कल विनय
अब वही तो क़ौम का भगवान है !!

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment

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Comment by विनय कुमार on August 7, 2018 at 11:56am
बहुत बहुत आभार आ तस्दीक़ अहमद खान साहब
Comment by विनय कुमार on August 7, 2018 at 11:56am
बहुत बहुत आभार आ रवि शुक्ला साहब
Comment by Ravi Shukla on August 6, 2018 at 11:53pm

आदरणीय विनय जी , ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 6, 2018 at 10:02pm

जनाब विनय कुमार साहिब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है   , मुहतरम समर साहिब के मशवरे से ग़ज़ल में निखार आ गया है , मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l 

Comment by विनय कुमार on August 6, 2018 at 5:05pm

बहुत बहुत आभार आ नीलम उपाध्याय जी

Comment by Neelam Upadhyaya on August 6, 2018 at 4:51pm

आदरणीय विनय  कुमार जी, अच्छी रचना की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई । 

Comment by विनय कुमार on August 6, 2018 at 11:54am

बहुत बहुत आभार आ संतोष खिरवाडकर जी

Comment by विनय कुमार on August 6, 2018 at 11:53am

बहुत बहुत आभार आ मुहतरम समर कबीर साहब, आपके निर्देशानुसार मैंने परिवर्तन कर दिया है. इसी तरह मार्गदर्शन करते रहिये, आभार

Comment by santosh khirwadkar on August 5, 2018 at 7:26pm

आदरणीय विनय जी , ग़ज़ल का शानदार प्रयास!

Comment by Samar kabeer on August 5, 2018 at 3:03pm

जनाब विनय कुमार जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन ग़ज़ल अभी समय चाहती है,कई मिसरे बह्र में नहीं हैं ।

'मगर वह अपनों से ही अंजान है'

इस मिसरे को यूँ कर लें :-

'हाँ, मगर अपनों से वो अंजान है'

'कभी रिश्ते भी थे नाते थे, मगर'

इस मिसरे को यूँ कर लें:-

'थे कभी रिश्ते भी नाते भी मगर'

'जिसे कहते थे कभी काबिल सभी
सबकी नज़रों में अभी नादान है'

इस शैर को यूँ कर लें '-

'जिसको कहते थे कभी क़ाबिल सभी

सबकी नज़रों में वो अब नादान है'

'जिसको सौंपी थी हिफाज़त चमन की
वही तो सबसे बड़ा बेइमान है'

इस शैर को यूँ कर लें :-

'जिसको सौंपी थी हिफ़ाज़त बाग़ की

बिक रहा उसका ही अब ईमान है'

'कभी था गुलज़ार जो शामों सुबह
वही अब तो दिख रहा शमसान है'

इस शैर को यूँ कर लें :-

'था कभी गुलज़ार जो शाम-ओ-सहर

अब वही दिखने लगा शमशान है'

'जिसने देखे अमन के सपने कभी
उसी का अब टूटता अरमान है'

इस शैर को यूँ कर लें :-

'जिसने देखे अम्न के सपने कभी

अब उसी का टूटता अरमान है'

'वही अब तो, कौम का भगवान है'

इस मिसरे को यूँ कर लें :-

'अब वही तो क़ौम का भगवान है'

बाक़ी शुभ शुभ ।

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