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तृप्ति ....

मेरा कहाँ था
वो पल
जो बीत गया
वक्त के साथ
तुम्हारा आकर्षण भी
रीत गया
यादों के धागों पर
मिलते रहे
अतृप्त तृप्ति की
अव्यक्त अभियक्ति के साथ
कहीं तुम
कहीं हम

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 485

Comment

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Comment by Samar kabeer on August 27, 2018 at 2:16pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on August 26, 2018 at 1:26pm

आदरणीय उस्मानी साहिब, आदाब। .. सृजन के भावों को मान देने का दिल से शुक्रिया।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 26, 2018 at 6:20am

रिश्ते कोई भी हों और रिश्तों के धागे कैसे भी धारण किये गये हों, ज़माने के चलनों ने रिश्तों और इंसानियत को अतृप्त ही छोड़ रखा है! बेहतरीन विचारोत्तेजक अंतिम पंक्तियों के साथ बेहतरीन सारगर्भित सृजन। हार्दिक बधाई और पवित्र पर्व पर इस रचना के लिए हार्दिक बधाई। पर्व रक्षाबंधन और भैया दूज की हार्दिक बधाइयां और शुभकामनाएं आदरणीय सुशील सरना साहिब।

Comment by Sushil Sarna on August 25, 2018 at 5:56pm

आदरणीय narendrasinh chauhanजी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से शुक्रिया।

Comment by narendrasinh chauhan on August 25, 2018 at 3:27pm
लाजवाब रचना

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