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मिश्रित दोहे :

कड़वे बोलों से सदा, अपने होते दूर।
मीठी वाणी से बढ़ें, नज़दीकियाँ हुज़ूर।।

भानु किरण में काँच भी, हीरे से बन जाय।
हीरा तो अपनी चमक, तम में ही दिखलाय।।

घडी-घड़ी क्यों देखता, जीव घडी की चाल।
घड़ी गर्भ में ही छुपा, उसका अंतिम काल।।

हंस भेस में आजकल, कौआ बांटे ज्ञान।
पीतल सोना एक सा, कैसे हो पहचान।।

राखी का त्यौहार है बहना की मनुहार।
इक -इक धागे में बहिन, बाँधे अपना प्यार।।


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 30

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Comment by Samar kabeer on August 27, 2018 at 11:46am

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छे दोहे रचे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 27, 2018 at 9:32am

आ. भाई सुशील जी, सुंदर दोहे हुए हैं । हार्दिक बधाई ।

Comment by Sushil Sarna on August 25, 2018 at 12:35pm


आदरणीय Mohammed Arif जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से शुक्रिया।

Comment by Mohammed Arif on August 24, 2018 at 10:27pm

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब,

                     समसामयिक विषयों पर बेहतरीन दोहे । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । बिक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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