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"कशमकश से यकबयक" (लघुकथा)

नववर्ष के रात्रिकालीन जश्न में मनमाफ़िक़ सेवन करने के साथ ही 'गरमा-गरम मंच' से मुख़ातिब हुए वे दोनों डकार मारते हुए आपस में चर्चा करने लगे :

"वाह.. नशा छा रहा है... मज़ा आ रहा है... !"

"कबाब उड़ाने के बाद तुझे तो शबाब से सराबोर इस नृत्य में भी 'जन्नत' ही नज़र आ रही होगी न!"

"तू तो कलमकार है! शराब के नशे में भी तुझे तो इस 'नंगी' सी नर्तकी में नंगी हो रही 'इंसानियत', 'हैवानियत' या 'तहज़ीब' के "बिम्ब" नज़र आ रहे होंगे या 'डिम्ब'! मुझे तो जिम में तराशे गये हर 'लिम्ब' की हर हरक़त में 'स्वर्ग' के "प्रतिबिम्ब" दृष्टिगोचर हो रहे हैं लेखक महोदय!"

फिर वह खड़े होकर अपनी टी-शर्ट उतारकर उसे लहराकर उसी जगह नाचने लगा। दूसरे ने वहीं कुर्सी में बैठे हुए ज़ेब से कलम और डायरी निकाली और अशआर लिखने लगा।

(लिम्ब Limb = हाथ-पैर आदि अंग; डिम्ब Dimb = आरंभिक अवस्था/अंडा.../हलचल/भय...)


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 2, 2019 at 8:28pm

आदाब। विगत वर्ष समापन तक इतने सारे सुधी सदस्यगण की मेरी रचना पर उपस्थिति हेतु सादर हार्दिक धन्यवाद। नववर्ष की हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 30, 2018 at 9:09am

बहुत ही प्रोत्साहक हौसला अफ़ज़ाई हेतु सादर हार्दिक आभार आदरणीय विजय निकोरे साहिब। सभी पाठकगण के प्रति हार्दिक आभार।

Comment by vijay nikore on September 26, 2018 at 3:14pm

सदैव समान आपकी एक और अच्छी लघुकथा पढ़ कर खुश हुआ। हार्दिक बधाई, आदरणीय शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 22, 2018 at 10:50pm

मेरी इस ब्लॉग पोस्ट पर अपना अमूल्य समय देकर अनुमोदन व हौसला अफ़ज़ाई हेतु तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब।

Comment by Samar kabeer on September 21, 2018 at 11:33am

जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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