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2122 2122 2122 212
भूख से मरता रहा सारा ज़माना इक तरफ़ ।
और वह गिनता रहा अपना ख़ज़ाना इक तरफ़ ।।

बस्तियों को आग से जब भी बचाने मैं चला ।
जल गया मेरा मुकम्मल आशियाना इक तरफ ।।

कुछ नज़ाक़त कुछ मुहब्बत और कुछ रुस्वाइयाँ ।
वह बनाता ही रहा दिल में ठिकाना इक तरफ ।।

ग्रन्थ फीके पड़ गए फीका लगा सारा सुखन ।
हो गया मशहूर जब तेरा फ़साना इक तरफ ।।

मिन्नतें करते रहे हम वस्ल की ख़ातिर मगर ।
और तुम करते रहे मुमक़िन बहाना इक तरफ़ ।।

हुस्न का जलवा तेरा बेइन्तिहा कायम रहा ।
और वह अंदाज भी था क़ातिलाना इक तरफ़ ।।

बात जब मतलब पे आई हो गए हैरान हम ।
रख दिया गिरवी कोई रिश्ता पुराना इक तरफ़ ।।

बेसबब सावन जला भादों जला बरसात में ।
रह गया मौसम अधूरा आशिकाना इक तरफ ।।

जब से मेरी मुफ़लिसी के दौर से वाक़िफ़ हैं वो ।
खूब दिल पर लग रहा उनका निशाना इक तरफ़ ।।

हक़ पे हमला है सियासत छीन लेगी रोटियां ।
चाल कोई चल रहा है शातिराना इक तरफ़ ।।

बे असर होने लगे हैं आपके जुमले हुजूऱ ।
आदमी भी हो रहा है अब सयाना इक तरफ़ ।।

        --नवीन मणि त्रिपाठी
         मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on October 4, 2018 at 11:52am

आ0 मुसाफ़िर साहब हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 4, 2018 at 11:52am

आ0 कबीर सर सादर नमन ।

सर अभी ठीक करता हूँ ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 3, 2018 at 4:37pm

आ. भाई नवीन जी,अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on October 2, 2018 at 12:15pm

जनाब नवीन जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

मतले के ऊला में 'भूँख' को "भूख" कर लें ।

छटे के ऊला में 'इन्तिहाँ' को "इन्तिहा" कर लें ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on September 30, 2018 at 6:40pm

आ0श्याम नारायण वर्मा जी हार्दिक आभार । 

Comment by Naveen Mani Tripathi on September 30, 2018 at 6:39pm

आ0 नरेंद्र सिंह चौहान साहब हार्दिक आभार ।

Comment by narendrasinh chauhan on September 28, 2018 at 6:07pm

खूब सुन्दर रचना आदरणीय 

Comment by Shyam Narain Verma on September 28, 2018 at 12:22pm

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी प्रणाम ,बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल ....हार्दिक बधाई ! 

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