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मौत आंगन में आकर टहलती रही

212 212 212 212
जिंदगी रफ़्ता रफ़्ता पिघलती रही ।
आशिकी उम्र भर सिर्फ छलती रही ।।

देखते देखते हो गयी फिर सहर ।
बात ही बात में रात ढलती रही ।।

सुर्ख लब पर तबस्सुम तो आया मगर ।
कोई ख्वाहिश जुबाँ पर मचलती रही ।।

इक तरफ खाइयाँ इक तरफ थे कुएं ।
वो जवानी अदा से सँभलती रही ।।

जाम जब आँख से उसने छलका दिया ।
मैकशी बे अदब रात चलती रही ।।

देखकर अपनी महफ़िल में महबूब को।
पैरहन बेसबब वह बदलती रही ।।

यूँ ही ठुकरा गया हुस्न जब इश्क़ को ।
तिश्नगी उम्र भर हाथ मलती रही ।।

उस परिंदे की फितरत है उड़ना बहुत ।
बे वज्ह आपको बात खलती रही ।।

बच गए हम तो क़ातिल नज़र से सनम ।
मौत आंगन में आकर टहलती रही ।।

रेत मानिंद सहरा में वो हाथ की ।
मुट्ठियों से हमारी फिसलती रही ।।

दिल जलाने की साजिश लिए साथ में ।
वो हमारी गली से निकलती रही ।।

नवीन मणि त्रिपाठी
- मौलिक अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 14, 2018 at 3:17pm

आ. भाई नवीन जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 11, 2018 at 10:04am

आ0 लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर साहब तहेदिल से शुक्रिया ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 11, 2018 at 10:03am

आ0 श्याम नारायण वर्मा साहब बहुत बहुत हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 11, 2018 at 10:02am

आ0 तेजवीर सिंह साहब तहेदिल से शुक्रिया।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 11, 2018 at 10:02am

आदारणीया वी ऍम वृष्टि जी ग़ज़ल तक आने के लिए बहुत बहुत आभार । 

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 11, 2018 at 9:59am

आ0 कबीर सर सादर प्रणाम । आपकी इस्लाह के अनुसार ग़ज़ल के कुछ शेर में परिवर्तन कर दिया है । आप जैसे गुरु अत्यंत दुर्लभ हैं । आपकी कृपा ऐसे ही बनी रहे तो यह नचीज भी थोड़ा थोड़ा ग़ज़ल को समझने लगा है ।

सादर नमन ।

एक बात और सर जैसे शब्द गैर इरादतन है वैसे साजिशन क्या नहीं हो सकता । इसको लेकर कन्फ्यूजन था । यद्यपि आपकी बात को मैं आँख बन्द करके मान लिया ।आप जो कहते वह बिलकुल सहीह होगा । 

सादर नमन के साथ आभार । 

Comment by Samar kabeer on October 10, 2018 at 2:12pm

एक बात और,यहाँ सब एक दूसरे को आदरणीय,मुहतरम, या जनाब कहकर सम्बोधित करते हैं,आप भी इस परम्परा को निभाने में सहयोग करें,ऐसी आशा है ।

Comment by Samar kabeer on October 10, 2018 at 2:07pm

मुहतरमा,ये एक सीखने सिखाने का मंच है, यहाँ हर सदस्य गुरु है और हर सदस्य शिष्य,जो जिसको आता है वो दूसरे को सिखा देता है,आप रचनाओं पर आई टिप्पणियां ध्यान पूर्वक पढ़ें तो बहुत कुछ सीखने को मिल जायेगा,शुभेच्छाएँ ।

Comment by V.M.''vrishty'' on October 10, 2018 at 12:40pm
श्रीमान Samar kabeer जी, प्रणाम! आपने सही कहा कि मैं मंच पर पहली बार आयी हूँ। अतः त्रुटियाँ स्वाभाविक हैं। मैं यहां के तौर-तरीकों से पूरी तरह अनभिज्ञ हूँ। निवेदन है कि आप मेरा मार्गदर्शन करें!
महोदय अभी तो मुझे स्वयं ही अनेकानेक सुधारों की आवश्यकता है,, तो मैं किसी की आलोचना के योग्य नही समझती स्वयं को......
आपके सुझाव के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!
Comment by Samar kabeer on October 10, 2018 at 12:15pm

जनाब v.m."prishth" जी आदाब,पहली बार मंच पर आपको देख रहा हूँ ,आपका स्वागत है।

संक्षिप्त टिप्पणी। करना सोशल मीडिया पर चलता है, ये ओबीओ की  परिपाटी नहीं है,यहाँ पहले रचनाकार को आदर से उसका नाम लेकर सम्बोधित करते हैं,उसके बाद उसकी रचना की आलोचना या तारीफ़ की जाती है,आपसे सहयोग की उम्मीद है ।

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