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ग़ज़ल- चींटियाँ उड़ने लगीं, शाहीन कह देने के बाद

2122 2122 2122 212

हर दुआ पर आपके आमीन कह देने के बाद
चींटियाँ उड़ने लगीं, शाहीन कह देने के बाद

आपने तो ख़ून का भी दाम दुगना कर दिया
यूँ लहू का ज़ायका नमकीन कह देने के बाद

फिर अदालत ने भी ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली

मसअले को वाक़ई संगीन कह देने के बाद

ये करिश्मा भी कहाँ कम था सियासतदान का
बिछ गईं दस्तार सब कालीन कह देने के बाद

फूल, तितली, चाँद-तारे, रंग से महरूम हैं

आपकी रानाई को रंगीन कह देने के बाद

ख़ूब उगला ज़ह्र यारों ने तअल्लुक़ तोड़ कर

साँप का बिल है मेरी अस्तीन कह देने के बाद

~ बलराम धाकड़

मौलिक/अप्रकाशित।

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Comment

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Comment by Balram Dhakar on October 27, 2018 at 4:18pm

आदरणीय अजय तिवारी जी, आपको ग़ज़ल पसन्द आई, मेरा लिखना सार्थक हुआ।

बहुत बहुत शुक्रिया!

धन्यवाद!

Comment by Balram Dhakar on October 27, 2018 at 4:17pm

आदरणीय महेंद्र कुमार जी, ग़ज़ल में शिरक़त और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया!

सादर!

Comment by Ajay Tiwari on October 27, 2018 at 7:53am

आदरणीय बलराम जी, एक और ऊर्जावान ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई. 

Comment by Mahendra Kumar on October 26, 2018 at 11:55am

बहुत ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल है आदरणीय बलराम धाकड़ जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।

Comment by Balram Dhakar on October 25, 2018 at 9:46pm

आदरणीय ब्रजेश जी, हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया!

सादर!

Comment by Balram Dhakar on October 25, 2018 at 9:45pm

आदरणीय सुरेंद्र जी, ग़ज़ल में शिरक़त और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया!

सादर!

Comment by Balram Dhakar on October 25, 2018 at 6:17pm

आदरणीय समर सर, सादर अभिवादन एवं धन्यवाद। आप जिस तवज्जो और जितना वक़्त देकर ग़ज़लों की तक़तीअ और मीमांसा करते हैं वह हम जैसे शागिर्दों के लिए किसी प्रकाश स्तम्भ से कम नहीं है। आपके कहे मुताबिक सुधार कर लिया जाएगा। पुनः बहुत आभार।

सादर।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 25, 2018 at 12:44pm

बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय..3,4,5 शे'र विशेष रूप से पसंद आये।आदरणीय समर जी की टिप्पड़ी शिक्षा पूर्ण है।

Comment by Samar kabeer on October 25, 2018 at 11:39am

// मामले को वाक़ई संगीन कह देने के बाद//

इस मिसरे में 'मामले' की जगह और  कोई शब्द रखें।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on October 25, 2018 at 11:23am

आद0 बलराम धाकड़ जी सादर अभिवादन। आपकी ग़ज़ल पर आद0 समर साहब की टिप्पणी से हम सबको भी ग़ज़ल और कथ्य की बारीकियों को समझने में मदद मिली। आपको ग़ज़ल पर मेरी दाद और बधाई निवेदित है।

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