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अब और न हिन्दू न मुसलमान कीजिये

221 1221 1221 212

गर हो सके तो मुल्क पे अहसान कीजिये ।।
अब और न हिन्दू न मुसलमान कीजिये ।।

भगवान को भी बांट रहे आप जात में ।
कितना  गिरे हैं सोच के अनुमान कीजिये ।।

मत  सेंकिए  ये रोटियां नफरत की आग पर ।
अम्नो सुकूँ के वास्ते फ़रमान कीजिये ।।

अब रोजियों के नाम भी हो जाए इंतजाम ।
कुछ तो किसी की राह को आसान कीजिये ।।

अपने ही उसूलों को मिटाने लगे हैं अब ।
कुर्सी के लिए आप न विषपान कीजिये ।।

ये फिक्र हमें भी है कि आबाद हो चमन ।
पैदा न वतन में कोई तूफ़ान कीजिये ।।

क़ातिल बना के छोड़ दिया आपने हुजूऱ ।
इंसान की औलाद को इंसान कीजिये ।।

जुड़ता कहाँ है दिल ये कभी टूटने के बाद ।
मुझको  न अभी  और  परेशान कीजिये ।।

उम्मीद मुझे कुछ नहीं है आप से जनाब ।
हक जो मेरा था शौक से कुर्बान कीजिये ।।

बदलेगी हुकूमत भी ज़माने के साथ साथ ।
छोटा न अभी आप ये अरमान कीजिये ।।

उनको जमी पे लाने का है वक्त आ गया ।
अब फैसलों पे आप भी मतदान कीजिये ।।

      ---नवीन मणि त्रिपाठी

 मौलिक अप्रकाशित 

Views: 545

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Comment by Naveen Mani Tripathi on December 1, 2018 at 11:17pm

आ0 दयाराम मैथानी साहब तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Dayaram Methani on December 1, 2018 at 10:51pm

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी, बहुत सुंदर गज़ल कही है। बधाई स्वीकार करें। निम्न शेर बहुत पसंद आया।...

ये फिक्र हमें भी है कि आबाद हो चमन ।
पैदा न वतन में कोई तूफ़ान कीजिये ।।

Comment by राज़ नवादवी on December 1, 2018 at 11:40am

वाह वाह, बहुत ख़ूब, आदरणीय नवीन शंकर त्रिपाठी जी, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे दाद के साथ बधाई. सादर. 

गर हो सके तो मुल्क पे अहसान कीजिये ।।
अब और न हिन्दू न मुसलमान कीजिये ।।

भगवान को भी बांट रहे आप जात में ।
कितना  गिरे हैं सोच के अनुमान कीजिये ।। क्या कहने. वाह वाह 

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 1, 2018 at 11:21am

आ0 कबीर सर नई बह्र पर आप ने गौर किया और ग़ज़ल को चेक इसके लिए शत शत आभार और नमन ।

Comment by Samar kabeer on December 1, 2018 at 11:06am

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ख़ुद साख़ता(अपने बनाये)अरकान पर ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,इस प्रयोग के लिए बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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