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ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (जीवन सरोज खिल के भी सुरभित नहीं हुआ।)

221, 2121, 1221, 212

आरोप ये गलत है कि पुष्पित नहीं हुआ।
जीवन सरोज खिल के हाँ सुरभित नहीं हुआ।

छल, साम, दाम, दण्ड, कुटिलता चरम पे थी,
ऐसे ही कर्ण रण में पराजित नहीं हुआ।

कैसा ये इन्क़लाब है, बदलाव कुछ नहीं,
अम्बर अभी तो रक्त से रंजित नहीं हुआ।

गिरकर संभल रहे हैं, गिरे जितनी बार हम, 
साहस हमारा आज भी खण्डित नहीं हुआ।

क्या मुझको मिल गया है, मुझे क्या नहीं मिला,

मन में तो है विषाद, मैं चिंतित नहीं हुआ।

विचलित हुई सदा ही ये नारी, ये सच नहीं,
गौतम कभी अहिल्या सा शापित नहीं हुआ।

मौलिक/अप्रकाशित।

~बलराम धाकड़ ।

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Comment by राज़ नवादवी on December 21, 2018 at 11:36am

आदरणीय बलराम धाकड़ जी, आदाब. ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, दाद के साथ बधाई स्वीकार करें. सादर 

Comment by Samar kabeer on December 20, 2018 at 3:06pm

जनाब बलराम धाकड़ जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Balram Dhakar on December 20, 2018 at 9:39am

आदरणीय सुरेंद्र जी, ग़ज़ल में शिरक़त और सुख़न नवाज़ी का बहुत बहुत शुक्रिया।

सादर।

Comment by नाथ सोनांचली on December 20, 2018 at 9:26am

आद0 बलराम धाकड़ जी सादर अभिवादन। बढ़िया रचना सृजित की आपने, दूसरे शैर के लिए अतिरिक्त दाद के साथ आपको हृदय तल से बधाई देता हूँ

कृपया ध्यान दे...

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