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बने हमसफ़र तेरी ज़ीस्त में कोई मेहरबाँ वो तलाश कर (१६)

11212 *4
बने हमसफ़र तेरी ज़ीस्त में कोई मेहरबाँ वो तलाश कर
जो हयात भर तेरा साथ दे कोई जान-ए-जाँ वो तलाश कर
***
तेरे सुर में सुर जो मिला सके तेरे ग़म में साथ निभा सके
तेरे संग ख़ुशियाँ मना सके कोई हमज़बाँ वो तलाश कर
***
कहीं डूब जाये न दरमियाँ कभी सुन के बह्र की धमकियाँ
चले नाव ठीक से ज़ीस्त की कोई बादबाँ वो तलाश कर
***
भला लुत्फ़ क्या मिले प्यार में नहीं गर अना रहे यार में
जो अदा से जानता रूठना कोई सरगिराँ वो तलाश कर
***
ये सुना है सात हैं  आसमाँ नहीं जानता कि सुकूँ कहाँ
कभी मिल सके जो ज़मीन से कोई आसमाँ वो तलाश कर
***
हुआ जद में देखिये चाँद भी चला मिह्र छू ने है आदमी
नए चाँद मिह्र जहाँ मिलें कोई कहकशाँ वो तलाश कर
***
बँधी प्यार की जहाँ डोर हो जहाँ एकता पे ही जोर हो
जहाँ मीर रहता है हमनज़र कोई कारवाँ वो तलाश कर
***
जहाँ राज करती हों मस्तियाँ जहाँ हों ग़मों की न बस्तियाँ
न हों बात बात पे तल्खियाँ कोई आशियाँ वो तलाश कर
***
करे दफ़्न राज़ तेरे जो सब सहे बोझ दिल का तेरे 'तुरंत'
कोई हमनवा कोई हमनशीं कोई राज़दाँ वो तलाश कर
***
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 22, 2019 at 1:59am

आदरणीय Samar kabeer साहेब ,आदाब ,

आपकी क़ीमती दाद मेरे लिए वाइस-ए-फ़ख्र है मोहतरम   | नवाज़िश-ओ-करम का दिल से शुक्रिया | मैंने कहकशां जानबूझ कर प्रयोग किया है एक आकाशगंगा में कई चाँद और सूरज और ग्रह होते हैं | सात है की टंकण त्रुटि सही कर रहा हूँ | सादर | 

Comment by Samar kabeer on January 21, 2019 at 11:00pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

ये सुना है सात हैआसमाँ नहीं जानता कि सुकूँ कहाँ '

इस मिसरे में 'सात है', को "सात हैं" कर लें ।

' नए चाँद मिह्र जहाँ मिलें कोई कहकशाँ वो तलाश कर'

"कहकशाँ" कहते हैं 'आकाश गंगा' इस लिहाज़ से इस मिसरे में "आसमाँ क़ाफ़िया उचित होगा । 

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