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हर बुढ़ापा जिन्दगी भर बेबसी खोता नहीं - गजल

२१२२/२१२२/२१२२/२१२


नींद में भी जागता रहता है जो सोता नहीं
हर बुढ़ापा जिन्दगी भर बेबसी खोता नहीं।१।


है जवानी भी  कहाँ  अब  चैन  के  परचम तले
सिर्फ बचपन ही कभी चिन्ताओं को ढोता नहीं।२।

ज़िन्दगी यूँ  तो  हसीं  है, इसमें  है  बस ये कमी

जो भी अच्छा है वो फिर से यार क्यों होता नहीं।३।


नफरतों का तम सदा को दूर हो जाये यहाँ
आदमी क्यों ऐसी  कोई  रोशनी बोता नहीं।४।


है रटा देती सियासत कुर्सियों की बात बस
कौन कहता है यहाँ पर आदमी तोता नहीं।५।


मोतियों से अश्क बिखरे दूब पर हैं देखना
झूठ कहती यार दुनियाँ आसमाँ रोता नहीं।६।


मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2019 at 4:19am

आ.भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार । आपके सुझाव उत्तम हैं । बदलाव कर लिया है देखियेगा ।

Comment by Samar kabeer on February 1, 2019 at 2:16pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'है  जवानी  भी  कहाँ  यूँ  चैन  के  परचम  तले
सिर्फ बचपन ही कभी चिन्ता को बस ढोता नहीं'

इस शैर के ऊला मिसरे में 'यूँ' को "अब" करना उचित होगा,और सानी मिसरे में 'बस' शब्द भर्ती का है,सानी यूँ कर सकते हैं:-

'सिर्फ़ बचपन ही यहाँ चिंताओं को ढोता नहीं'

'जिन्दगी वैसे हसीं  है  जिसमें  बस  ये ही कमी '

इस मिसरे को यूँ कर लें,गेयता बढ़ जाएगी:-

'ज़िन्दगी यूँ तो हसीं है,इसमें है बस ये कमी'

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 1, 2019 at 8:00am

आ. भाई सुरेंद्र जी, सादर अभिवादन । गजल की प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on February 1, 2019 at 7:17am

आद0 लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर अभिवादन। बढिया ग़ज़ल कही आपने। बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 31, 2019 at 7:29pm

आ. भाई दयाराम जी, गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by Dayaram Methani on January 31, 2019 at 11:42am

नींद में भी जागता रहता है जो सोता नहीं
हर बुढ़ापा जिन्दगी भर बेबसी खोता नहीं।.......बहुत सुंदर आगाज़।

है रटा देती सियासत कुर्सियों की बात बस
कौन कहता है यहाँ पर आदमी तोता नहीं।...............बहंत गहरा कटाक्ष।


मोतियों से अश्क बिखरे दूब पर हैं देखना
झूठ कहती यार दुनियाँ आसमाँ रोता नहीं।.......बहुत ही लाजवाब शेर।

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी इस सुंदर सृजन के लिए बहुत बहुत बधाई।

.....दयाराम मेठानी

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