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ग़ज़ल (यही ज़माने को खल रहा है )

ग़ज़ल (यही ज़माने को खल रहा है )
(मफा इलातुन _मफा इलातुन)

यही ज़माने को खल रहा हैl
वो मेरे हम राह चल रहा है l

वो हैं मुखातिब तो मुझसे लेकिन
कलेजा यारों का जल रहा है l

नज़र में है सिर्फ उसके मंज़िल
जो गिरते गिरते संभल रहा है l

रखें निगाहों पे कैसे काबू
वो सामने से निकल रहा है l

बदल के शीशा है फायदा क्या
तेरा भी अब हुस्न ढल रहा है l

खयाल में आ रहा है दिलबर
न यूँ मेरा दिल मचल रहा है l

दगा की तुहमत लगी तो जाना
मुझे वो तस्दीक छल रहा है l

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 4, 2019 at 9:14pm

जनाब ब्रजेश कुमार साहिब, ग़ज़ल पसंद करने और आपकी हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 4, 2019 at 11:21am

वाह बहुतखूब ग़ज़ल कही है आदरणीय तस्दीक जी...

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 2, 2019 at 5:04pm

मुहतरम जनाब समर साहिब आ दाब , ग़ज़ल पर आपकी खूबसूरत प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by Samar kabeer on April 2, 2019 at 11:08am

जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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