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जिंदगी को गुनगुना कर चल दिए-सलीम रज़ा रीवा

ओबीओ को समर्पित एक क़त'आ  

----------------------------------

जब से तेरी मेहरबानी हो गई
ख़ूबसूरत ज़िन्दगानी हो गई
हम हुए तेरे दिवाने इस तरह
जिस तरह 'मीरा' दिवानी हो गई

...........

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़

--------

जिंदगी को गुनगुना कर चल दिए

मौत को अपना बना कर चल दिए

oo

उम्र भर की दोस्ती जाती रही

आप ये क्या गुल खिलाकर चल दिए

oo

अब यकीं उनकी ज़बाँ का क्या करें

जो फ़क़त सपने दिखाकर चल दिए 

oo

आज उनका दिल दुखा शायद बहुत

बज़्म से आँसू बहा कर चल दिए

oo

बे-बसी में और क्या करते  'रज़ा'

दर्द-ओ-ग़म अपना सुनाकर चल दिए

_________________________

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by SALIM RAZA REWA on April 8, 2019 at 4:39pm

बृजेश कुमार 'ब्रज' साहब,
आपकी पुरख़ुलूस महब्बत के लिए दिली शुक्रिया,

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 4, 2019 at 11:26am

वाह वाह आदरणीय सलीम साहब बहुतखूब ग़ज़ल कही है और क़त'आ भी लाजबाब..

Comment by SALIM RAZA REWA on April 3, 2019 at 6:08pm
मोहतरम समर कबीर साहब,
आपकी पुरख़ुलूस हौसला अफ़जाई और
टंकण ग़लती के इशारे के लिए बहुत बहुत शुक्रिया l
Comment by Samar kabeer on April 3, 2019 at 12:13pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,क़ित'अ भी अच्छा हुआ है,और ग़ज़ल भी अच्छी हुई है,मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

'जब से तेरी मेहरबानी हो गई'

इस मिसरे में 'मेहरबानी' को "मह्रबानी" कर लें ।

Comment by SALIM RAZA REWA on April 2, 2019 at 2:01pm
हौसला अफजाई के लिए बेहद ममनून ओ मशक़ूर हूँ
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 2, 2019 at 1:37pm

जनाब भाई सलीम रज़ा साहिब, बहुत ही उम्दा क़ता और ग़ज़ल हुई है दाद के साथ शेर दर शेर मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l मुद्दत के बाद आपको ब्लॉग में देख कर बहुत खुशी हुई l  वज्‍म _बज्‍म 

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