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आख़िर ये इश्क़ क्या है - सलीम रज़ा रीवा

मफ़ऊल फ़ाइलातुन मफ़ऊल फ़ाइलातुन

_____________

आख़िर ये इश्क़ क्या है जादू है या नशा है

जिसको भी हो गया है पागल बना दिया है

oo

हाथो में तेरे हमदम जादू नहीं तो क्या है

मिट्टी को तू ने छूकर सोना बना दिया है

oo

उस दिन से जाने कितनी नज़रें लगी हैं मुझपर

जिस दिन से तूने मुझको अपना बना लिया है

oo

खिलता हुआ ये चेहरा यूँ ही रहे सलामत

तू ख़ुश रहे हमेशा मेरी यही दुआ है

oo

इक पल में मुस्कुराना इक पल में रूठ जाना

तेरी इसी अदा ने दीवाना कर दिया है

________________________________

"मौलिक व अप्रकाशित"

बहरे मज़ारिअ मुसम्मन मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ मुख़न्नक मक़्सूर

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Comment by SALIM RAZA REWA on April 9, 2019 at 10:11pm
बहुत शुक्रिया बृजेश जी
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 9, 2019 at 9:11am

बड़ी ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय सलीम जी..बधाई

Comment by SALIM RAZA REWA on April 7, 2019 at 9:22pm
आपकी पुरख़ुलूस हौसला अफ़जाई का बेहद शुक्रिया मोहतरम तस्दीक साहब,
Comment by SALIM RAZA REWA on April 7, 2019 at 9:21pm
आपकी पुरख़ुलूस हौसला अफ़जाई का बेहद शुक्रिया मोहतरम समर साहब,
Comment by Samar kabeer on April 7, 2019 at 6:10pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,ग़ज़ल अच्छी हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 4, 2019 at 9:13pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब आ दाब, उम्दा ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l 

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