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1-
नेता आपस में लड़ें, रोज जुबानी जंग।
मर्यादाएँ हो रहीं, इस चुनाव में भंग।।
इस चुनाव में भंग, सभी ने गरिमा खोई।
फैलाकर उन्माद, परस्पर नफरत बोई।।
जनता का इस बार, बनेगा वही चहेता।
जो कर सके विकास, चाहिए ऐसा नेता।।
2-
बातें बेसिरपैर कीं, नेता करते रोज।
मर्यादाएँ तोड़कर, दिखलाते हैं ओज।।
दिखलाते हैं ओज, मंच से देते गाली।
खुद की ठोकें पीठ,बजावें खुद ही ताली।।
संसद में जो लोग, चलाते मुक्के लातें।
गरिमा के विपरीत, वही करते हैं बातें।।
3-
नेता कुछ भी बोलकर, सिर्फ चाहते जीत।
वाणी से उगलें जहर, गरिमा के विपरीत।।
गरिमा के विपरीत, करें वे गड़बड़झाला।
फिर भी सीनातान, कहें खुद को रखवाला।।
मैं निर्धन मजदूर, नहीं कुछ लेता-देता।
पहन विदेशी सूट, शान से कहते नेता।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

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Comment by Hariom Shrivastava on April 28, 2019 at 9:51pm

आदरणीया Dr.Prachi Singh जी,आपकी उपस्थिति व प्रेरक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार।

Comment by Hariom Shrivastava on April 28, 2019 at 9:49pm

आपकी उपस्थिति व उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक आभार आदरणीय Samar Kabeer साहब।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 25, 2019 at 9:10pm

तीनों कुण्डलिया बहुत अच्छी बनी हैं , कथ्य भी सामयिक और सधा  हुआ है 

हार्दिक बधाई 

Comment by Samar kabeer on April 23, 2019 at 3:09pm

जनाब हरिओम श्रीवास्तव जी आदाब,अच्छे कुण्डलिया छन्द हुए हैं,बधाई स्वीकार करें ।

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