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ग़ज़ल _किसी से प्यार किसी से क़रार ख़ैर ख़ुदा

ग़ज़ल

( मफाइलुन_फ इ लातुन_मफाइलुन_फेलुन) 

किसी से प्यार किसी से क़रार ख़ैर ख़ुदा
करे वो तीर से दो दो शिकार ख़ैर ख़ुदा

अलम छुपाने की कोशिश तो हँस के की लेकिन
निगाहे नम ने किया आश कार ख़ैर ख़ुदा

नज़र पे पहरा है दीवाना फ़िर भी कूचे में
सनम को अपने रहा है पुकार ख़ैर ख़ुदा

तवक्को उनसे है फैसल की, कर रहे हैं जो
फरेबियों में हमारा शुमार ख़ैर ख़ुदा

लगा ये देख के उनको उदास महफ़िल में
खिज़ा के साथ है आई बहार ख़ैर ख़ुदा

किसी की पड़ गई तारीफ़ दोस्तों मंहगी
दिया है उसने नज़र से उतार ख़ैर ख़ुदा

उसी ने की दगा तस्दीक तुझसे उल फत में
तुझे था जिसपे बहुत एतबार ख़ैर ख़ुदा

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 21, 2019 at 12:11pm

जनाब भाई लक्ष्मण धा मी साहिब, ग़ज़ल पसंद करने और आपकी हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 21, 2019 at 9:18am

आ. भाई तस्दीक अहमद जी, सादर अभिवादन। बेहतरीन गजल हुयी है । हार्दिक बधाई।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 20, 2019 at 5:48pm

जनाब भाई सुरेंद्र नाथ साहिब, ग़ज़ल पर आपकी खूबसूरत प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया l

Comment by नाथ सोनांचली on May 20, 2019 at 5:44pm

आद0 तस्दीक अहमद खान साहब सादर अभिवादन। बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल कही आपने। वाह वाह वाह। बहुत बहुत बधाई आपको। इस शैर पर अतिरिक्त तालियां

किसी की पड़ गई तारीफ़ दोस्तों मंहगी 
दिया है उसने नज़र से उतार ख़ैर ख़ुदा

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