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बेसुरी खाँसी ....

मन ढूँढता रहा
नीरवता में
खोये हुए कोलाहल को
साथ ले गई
अपनी बेसुरी आवाज़ें
खाँसी की
जीवन के अंतिम पहर में
अपने साथ
जाने कितने सपने,
कितने दर्द छुपे थे
बूढ़ी माँ की
उस बेसुरी खरखरी
खाँसी में
पहले वो खाँसती थी
तो नींद नहीं आती थी
अब
न माँ है
न उसकी बेसुरी खाँसी
फिर भी
नींद नहीं आती
बस
एक अजीब सी रिक्तता में
ढूँढता हूँ
फिर वही बेसुरी खाँसी की
खरखरी आवाज़
और
उस आवाज़ के पल्लू से बंधी
अपनी
माँ
नीरवता में
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on August 27, 2019 at 8:10pm

आदरणीय  Ram Ashery  जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार lआदरणीय जी सृजन आपकी स्नेहिल उपस्थिति का आभारी है।

Comment by Ram Ashery on August 26, 2019 at 9:50pm

अपने अंतरात्मा की आवाज को बहुत ही अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है आपको इस सुंदर रचना के लिए बधाई स्वीकार हो । 

 

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