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फिर से जी लूँ ... अतुकांत कविता

ज़िम्मेदारियों में उलझी ज़िंदगी,
सरक-सरक कर गुज़रने लगी।

हादसों का सिलसिला ऐसा चला,
उम्र का अहसास गहराता गया।

उड़ने की ख़्वाहिश और सारे ख़्वाब,

कहीं घुप अंधेरे में आंखें मूंदे बैठ गए।

अचानक तेज़ हवा के झोंके ने,
यूँ छू दिया कि नये अरमान उमड़ पड़े।

इस लम्बी रात का सुंदर सवेरा हुआ,
बादल छँट गए, इंद्रधनुष ने रंग बिखेरे।

फिर से जी लूँ, दिल ने तमन्ना की,
ऐ हवा के हसीं झोंके, रूख़ ना बदल लेना ।

मौलिक व् अप्रकाशित।

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 28, 2019 at 5:56pm

अच्छी कविता है आदरणीया...

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 25, 2019 at 7:52pm

इस लम्बी रात का सुंदर सवेरा हुआ,
बादल छँट गए, इंद्रधनुष ने रंग बिखेर दिए।
बहुत ही सुन्दर , उत्साव बर्धक पंक्ति , मन के संशय फिर भी बने रहते हैं जोकि स्वाभाविक है , दूसरी पंक्ति , कुल मिला कर बहुत ही गंभीर एवं आकर्षक रचना , हार्दिक बधाई , आदरणीय सुश्री उषा जी , सादर।

Comment by Samar kabeer on September 25, 2019 at 11:56am

मुहतरमा ऊषा जी आदाब,एक ही कविता को पटल पर दुबारा पोस्ट करने की ज़रूरत नहीं,अगर कोई ग़लती सुधारना हो तो पहली कविता को ही एडिट कर सकती हैं ।

कृपया ध्यान दे...

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