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कुछ क्षणिकाएँ :

कुछ क्षणिकाएँ :

ख़ामोश जनाज़े
करते हैं अक्सर
बेबसी के तकाज़े

ज़माने से

..........................

सवालों में उलझी
जवाबों में सुलझी
अभिव्यक्ति की तलाश में
बीत गयी
ज़िंदगी

.................................

कोलाहल
ज़िंदगी का
डूब जाता है
श्वासहीन एकांत में

...................................

देकर
एक आदि को अंत
लौटते हुए
सभी खुश थे अंतस में
लेकर ये भ्रम
अभी दूर है
अंत
हमारी श्वासों का

............................

रह गया मैं
तुम्हारे पास
कल के एकांत में
उजालों से बचाना
ये निगल न जाए मुझको
तुम्हारे
स्मृति कलश से

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 823

Comment

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Comment by Sushil Sarna on October 1, 2019 at 4:44pm

आदरणीय विजय निकोर जी आपकी मनभावन एवं प्रेरक प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ। हार्दिक आभार।

Comment by vijay nikore on October 1, 2019 at 3:26pm

बहुत ही खूबसूरत । अच्छा लिखते हैं हमेशा। बधाई, मित्र सुशील जी।

Comment by Sushil Sarna on October 1, 2019 at 3:04pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... सर सृजन आपकी बहुमूल्य प्रेरक प्रतिक्रिया का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on October 1, 2019 at 3:03pm

आदरणीय  बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आपकी मनभावन एवं प्रेरक प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ। हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on October 1, 2019 at 3:03pm

आदरणीय केवल प्रसाद सत्यम जी सादर प्रणाम। सृजन आपकी बहुमूल्य प्रेरक प्रतिक्रिया का आभारी है। आपका सुझाव अनुकरणीय है। सर मेरे सृजन में जब तक भाव शब्दों में और शब्द भावों में समाहित नहीं होते तब तक मैं संक्षिप्तता से समझौता नहीं करता। इंगित त्रुटि एडिटिंग के समय रह गई, इस हेतु आपका तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on October 1, 2019 at 2:58pm

आदरणीय  डॉ छोटेलाल सिंह जी आपकी मनभावन एवं प्रेरक प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ। हार्दिक आभार। 

Comment by Samar kabeer on September 29, 2019 at 11:08am

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी क्षणिकाएँ हुई हैं,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 28, 2019 at 6:09pm

आदरणीय सुशील जी बहुत ही सुन्दर रचना..

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on September 27, 2019 at 9:04pm

आ. सुशील भाई जी, बेहतरीन क्षणिकाए आश्वस्तिकारक हैं.  पर शब्दों की अत्यधिक संक्षिप्तता जरूरी नहीं है.

'रह गया मैं
तुम्हारे पास
कल के एकांत में
उजालों से बचाना
ये निगल न जाए मुझको
तुम्हारे
स्मृति कलश से 

अति सुन्दर अभिव्यक्ति की हार्दिक बधाई.

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on September 27, 2019 at 6:58pm

आदरणीय सुशील सरना जी बहुत ही सुंदर क्षणिकाएं अत्यंत सराहनीय बहुत बहुत बधाई

कृपया ध्यान दे...

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