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कुछ क्षणिकाएँ :

कुछ क्षणिकाएँ :

ख़ामोश जनाज़े
करते हैं अक्सर
बेबसी के तकाज़े

ज़माने से

..........................

सवालों में उलझी
जवाबों में सुलझी
अभिव्यक्ति की तलाश में
बीत गयी
ज़िंदगी

.................................

कोलाहल
ज़िंदगी का
डूब जाता है
श्वासहीन एकांत में

...................................

देकर
एक आदि को अंत
लौटते हुए
सभी खुश थे अंतस में
लेकर ये भ्रम
अभी दूर है
अंत
हमारी श्वासों का

............................

रह गया मैं
तुम्हारे पास
कल के एकांत में
उजालों से बचाना
ये निगल न जाए मुझको
तुम्हारे
स्मृति कलश से

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on September 27, 2019 at 2:17pm

आदo  Rachna Bhatia जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। 

Comment by Rachna Bhatia on September 26, 2019 at 6:02pm

आदरणीय बहुत अच्छी क्षणिकाएं ।

ख़मोश जनाज़े...लाजवाब।हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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