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अभी जरा मैं धनुष सजा लूं  फिर आता हूँ  

विष से थोड़े विशिख बुझा लूं फिर आता हूँ I

 

सोने की लंका बनती है तो  बन जाने दो

रावण का डंका घहराता है  घहराने  दो

धर्म शास्त्र खंडित होते हैं  मत घबराओ  

छा रहा यज्ञ का धूम मलिन तो  छाने दो

 

लेकिन हो रहा सतीत्व हरण यदि नारी का

लूटा  जाता है सर्वस्व किसी  सुकुमारी का

तो अग्निबाण  मेरा अणु-बम सा फूटेगा

मैं प्रत्यंचा खींच धनुष की अब आता हूँ I

 

 

राक्षस था पर उसने  सीता  को छुआ नही

छल किया नहीं, खेला कोई भी जुआ नही

बस प्रणय निवेदन करता था धमकाता था

दुर्धर्ष आचरण कोई भी तो  हुआ नहीं

 

पर नर होकर अभिनव बसंत  जिसने लूटा  

वह बचे के मेरा बाण अभी सत्वर छूटा

शत-शत रावण को प्राण दान  मैं दे दूंगा

तुझको कोई क्षमा नहीं शठ ! मैं आता हूँ I

 

 

यह धरती पहले भी  कितना थर्राई थी   

तब  शपथ राक्षस के विनाश की खाई थी

अब समय आ गया सर्वनाश इनका भी हो 

मुझसे कहने निर्भया विकल इक आयी थी 

 

मैं राम, सदा अविराम भला चुप बैठूंगा

अगर समस्या है अशेष तह तक पैठूंगा   

अमिय-कुंड फिर भस्म करूंगा रावण जैसा

साध रहा शर प्रत्यंचा में  बस आता  हूँ I

 

(मौलिक /अप्रकाशित ) 

 

 

 

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 31, 2019 at 2:07pm

आदाब। बेहतरीन तीखा व विचारोत्तेजक सृजन। हार्दिक बधाई जनाब डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव साहिब।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 31, 2019 at 12:43pm

विजय निकोर जी  सादर आभार 

Comment by vijay nikore on December 30, 2019 at 6:24am

आपकी रचना बहुत ही अच्छी लगी। बधाई, मित्र गोपाल नारायन जी।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 29, 2019 at 6:16pm

आ० सरना जी . अनुग्रहीत हूँ I 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 29, 2019 at 6:15pm

आ० धामी जी , आभार i 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 29, 2019 at 6:15pm

आ० समर कबीर जी, सुधार कर दिया है I  सादर I 

Comment by Sushil Sarna on December 24, 2019 at 6:39pm

वाह अति सुंदर और सार्थक सृजन आदरणीय डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी , दिल से बधाई स्वीकार करें।

Comment by Samar kabeer on December 24, 2019 at 2:52pm

जनाब डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

'अभी जरा मैं धनुष सजा लूं  फिर आता हूँ  

 बुझे हुए विष बाण सजा लूं  फिर आता हूँ'

इन पंक्तियों में तुकांतता क्या है?

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 19, 2019 at 7:55am

आ. भाई गोपाल नारायण जी, सादर अभिवादन । इस रचना को पढ़ मन आनंदित हुआ। ओज भरती इस बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई।

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