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एक ग़ज़ल ---नहीं आता

एक ग़ज़ल ....
न याद आओ मुझे तुम कोई पल ऐसा नहीं आता
तुम्हारे ख़्वाब में फिर भी मेरा चेहरा नहीं आता

*तुम अपने बाप के शाने पे रखदो ख़्वाहिशें अपनी*
*मेरे बच्चों हक़ीक़त में कोई सांता नहीं आता*

मेरी ग़ज़लों में पढ़ लेना मेरे ग़म की इबारत तुम
मुझे गाना तो आता है मगर रोना नहीं आता

जिधर देखो उधर नफ़रत जहाँ जाओ वहाँ साज़िश
तअज्जुब है अदीबों आपको गुस्सा नहीं आता

ज़रा ख़ुश पेट होता है मगर दिल ख़ूब रोता है
मनीआर्डर तो आता है मगर बेटा नहीं आता

मुसीबत, रोग, आफ़त, मुश्किलें उस घर में आती है
पसीने की कमाई का जहाँ पैसा नहीं आता

मेरा तो फ़र्ज़ है दुनिया में सबको रौशनी देना
बिना पर जात-मज़्हब की मुझे चलना नहीं आता
मौलिक और अप्रकाशित
©ख़ुरशीद खैराड़ी जोधपुर ।
शाना-- कंधा
अदीब-- साहित्यकार
त अज्जुब-- आश्चर्य , अचम्भा
बिना -- नींव, आधार।

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Comment

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Comment by vijay nikore on January 23, 2020 at 8:10am

गज़ल बहुत अच्छी बनी है, मित्र खुर्शीद खैराड़ी जी। बधाई।

Comment by मनोज अहसास on January 21, 2020 at 7:27pm

एक बेहद शानदार गजल के लिए हृदय से दाद पेश करता हूं आदरणीय मित्र आदरणीय समर कबीर साहब गजल को देख ही चुके हैं इसलिए अब गजल मुकम्मल हो गई है सादर

Comment by नाथ सोनांचली on January 20, 2020 at 2:45pm

आद0 खुर्शीद खैराड़ी जी सादर अभिवादन। बेहतरीन मुरस्सा और उम्दा ग़ज़ल पढ़ने को मिली,, शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।

Comment by Samar kabeer on January 19, 2020 at 9:17pm

जनाब ख़ुर्शीद खैराड़ी जी आदाब, बहुत समय बाद ओबीओ पर आपको देख कर प्रसन्न हूँ ।

बहुत उम्द: और मुरस्सा ग़ज़ल से नवाज़ा आपने इस मंच को,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

तअज्जुब है अदीबों आपको गुस्सा नहीं आता'

'गुस्सा'--"ग़ुस्सा"

'मुसीबत, रोग, आफ़त, मुश्किलें उस घर में आती है'

इस मिसरे में 'है' को "हैं" कर लें ।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on January 15, 2020 at 10:24am

आदरणीय ख़ुर्शीद साहब, आदाब। बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें।

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