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गज़ल -6 ( चल गया जादू सभी अंधे औ बहरे हो गए)

2122 2122 2122 212

चल गया जादू सभी अंधे औ बहरे हो गए
ज़ालिमों के ज़ुल्म के दिन अब सुनहरे हो गए //१

था किया वादा बनाएगा महल सपनों का वो
यूँ किया उसने कि गड्ढे और गहरे हो गए //२

चुप है हाकिम चुप है मुंसिफ चुप है ये सारा जहाँ
मुजरिमों की लिस्ट में मासूम चेहरे हो गए //३

हाथ में अब आ गया है ज़ालिमों के वो हुनर
राम हारे रावणों के अब दशहरे हो गए //४

झूठ बोले हर सभा में और पा जाए सनद
सच जो बोले उस ज़ुबाँ पे सख़्त पहरे हो गए //५

-- क़मर जौनपुरी
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 26, 2018 at 4:02pm

आ. भाई कमर जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Vivek Raj on November 21, 2018 at 8:00pm

जनाब क़मर साहब अच्छी ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद कुबूल फरमाएं


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 21, 2018 at 11:08am

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है क़मर साहब दाद स्वीकारें 

Comment by क़मर जौनपुरी on November 21, 2018 at 7:57am

बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम समर कबीर साहब। इस्लाह के मुताबिक सुधार कर लिया गया है। हमेशा नवाज़िश बनाये रखें।

Comment by Samar kabeer on November 20, 2018 at 12:04pm

जनाब क़मर जौनपुरी साहिब आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

यूँ किया फितरत कि गड्ढे और गहरे हो गए'

इस मिसरे में 'फ़ितरत'शब्द मुनासिब नहीं,इस मिसरे को यूँ कर लें :-

' यूँ किया उसने कि गड्ढे और गहरे हो गए'

' चुप है हाकिम चुप है मुंसिफ चुप है सारा ये जहाँ'

इस मिसरे को यूँ करलें,गेयता बढ़ जाएगी:-

'चुप है हाकिम,चुप है मुंसिफ़, चुप है ये सारा जहाँ'

Comment by क़मर जौनपुरी on November 20, 2018 at 10:42am

बहुत बहुत शुक्रिया जनाब तेज वीर सिंह जी हौसला आफ़ज़ाई के लिए।

Comment by TEJ VEER SINGH on November 20, 2018 at 10:38am

हार्दिक बधाई आदरणीय कमर जौनपुरी जी। बेहतरीन गज़ल।

चुप है हाकिम चुप है मुंसिफ चुप है सारा ये जहाँ
मुजरिमों की लिस्ट में मासूम चेहरे हो गए //३

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