इतने कांटे
कि उनसे बचते-बचते
गुलाब क्या
हर फूल से हम
दूर हो गए .......... 1.
पेड़ कहीं जाते नहीं
फल पक जाएँ
तो रुक पाते नहीं....... 2 .
तुम क्या गये
मेरी तन्हाई
भी ले गये .......…… 3.
और यह भी , यूँ ही,
उनका लिखा शेर खूब चला, खूब चला, खूब चला,
चलना ही था , ट्रक के पीछे जो लिखा था ॥
मौलिक एवं अप्रकाशित
Comment
आदरणीय केवल प्रसाद जी , क्षणिकाएँ आपको अच्छी लगीं , लिखना सार्थक हुआ. आपकी प्रशस्ति के लिए ह्रदय से बहुत बहुत आभार, धन्यवाद, सादर.
आदरणीय समर कबीर साहब, नमस्कार , आपकी प्रशस्ति के लिए ह्रदय से बहुत बहुत आभार, धन्यवाद, सादर.
आ0 विजय शंकर भाई जी, अतीव सुंदर क्षणिकाएँ मुग्ध कर रही हैं. बधाई. स्वीकारे. सादर
आपकी क्षणिकाएँ पढ़ कर आनन्द आया। बधाई, विजय जी।
आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान जी, आपको क्षणिकाएँ पसंद आईं , आपका बहुत बहुत आभार, एवं धन्यवाद, सादर।
आदरणीय डॉo गोपाल नारायण जी, आपको क्षणिकाएँ पसंद आईं , आपका बहुत बहुत आभार, एवं धन्यवाद, सादर।
आदरणीय सुनील प्रसाद जी, आपको क्षणिकाएँ पसंद आइन , आभार, एवं धन्यवाद, सादर।
अति सुन्दर सर
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