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GAZAL-मेरा मज़हब यही सिखाता है !! SALIM RAZA REWA

                   ग़ज़ल 
मेरा  मज़हब  यही  सिखाता है !!
सारी  दुनिया  से    मेरा नाता  है !!
 
ज़िन्दगी कम  है बाँट  ले खुशियाँ !!
दिल किसी का तू  क्यूँ  दुखाता है !!
 
हर  भटकते  हुए  मुसाफ़िर को !!
सीधा   रस्ता  वही  दिखाता है !! 
 
चहचहाते   हुए  परिन्दों   को !!
कौन   दाना  यहाँ  चुग़ाता  है !!
 
दुश्मनों  के  तमाम  चालों  से !!
मेरा  रहबर  मुझे   बचाता  है !!
 
दोस्त उसको ही बस कहा जाए !!
मुश्किलों में  जो काम आता   है !!
 
दुश्मनों से भी बढ़ के है वो  रज़ा  !! 
रास्ते  में  जो  छोड़  जाता   है  !!   

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Comment

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Comment by Saurabh Pandey on March 3, 2013 at 10:48am

ग़ज़ल के लिए बहुत-बहुत बधाई.. . मक्ते ने तो कमाल किया हुआ है !!

वाह वाह !!

Comment by वीनस केसरी on March 3, 2013 at 1:53am

दुश्मनों से भी बढ़ के है वो  रज़ा  !! 
रास्ते  में  जो  छोड़  जाता   है  !!  

क्या कहने
बहुत खूब
शानदार ग़ज़ल हुई है ...

Comment by ram shiromani pathak on March 2, 2013 at 2:52pm

मेरा  मज़हब  यही  सिखाता है !! 
सारी  दुनिया  से    मेरा नाता  है !!

वाह बहुत खूब!!!आदरणीय रज़ा जी 

Comment by Abhinav Arun on March 2, 2013 at 2:02pm
चहचहाते   हुए  परिन्दों   को !!

कौन   दाना  यहाँ  चुग़ाता  है !!

waah kya khoob sher hai shaandaar dili mubarakbaad salim ji !

Comment by pawan amba on March 2, 2013 at 5:45am

bahut khub likha sir..

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on March 2, 2013 at 12:42am

मेरा  मज़हब  यही  सिखाता है !!
सारी  दुनिया  से    मेरा नाता  है !!

वाह बहुत खूब!!!

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