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ग़ज़ल: दिल ए नादान से हरगिज़ न संभाली जाए

दिल ए नादान से हरगिज़ न संभाली जाए 
आरजू ऐसी कोई दिल में न पाली जाए

जान मांगी है तो अपनी भी यही कोशिश है 
ऐ मेरे दोस्त तेरी बात न खाली जाए

अपने हाथों के करिश्मे पे भरोसा करके 
अपनी सोई हुई तक़दीर जगा ली जाए

आज फिर छत पे मेरा चाँद नज़र आया है 
क्यूँ न फिर आज चलो ईद मना ली जाए

घर में दीवार उठी है तो कोई बात नहीं 
ऐसा करते हैं कि छत अपनी मिला ली जाए

जब किसी और के बस में नहीं है खुश रखना 
खुद ही खुश रहने की तरकीब निकाली जाए

जब किसी को भी गुनाहों की सज़ा देनी हो
इक नज़र अपने गुनाहों पे भी डाली जाए

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by SALIM RAZA REWA on November 14, 2017 at 7:15pm
अलोक जी
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद, कमिओं को पहले ही बताया जा चुका है, भाई हम सब की ख़ुश क़िस्मती है कि इस ब्लाग में बड़े ही उम्‍दा लोग है जिनके वज़ह से ग़लती सुधार जाती है,..
Comment by Alok Rawat on November 14, 2017 at 2:09pm

मोहतरम अफ़रोज़ साहब आपका बहुत बहुत शुक्रिया। आप लोगों की बातों का ख्याल रखूंगा।  

Comment by Afroz 'sahr' on November 13, 2017 at 10:01pm
आदरणीय आलोक रावत इस रचना पर शेर दर शेर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । आदरणीय समर साहिब के मशविरों पर गौ़र करें। आपने नियमानुसार अर्कान नहीं लिखें हैं,,,,,,
Comment by Alok Rawat on November 13, 2017 at 7:50pm

aap log yun hi sarparasti karte rahenge to behtar tareeqe se ghazal kah sakoonga...

Comment by Alok Rawat on November 13, 2017 at 7:48pm

janaab mohaammad arif sahab... janaab samar kabeer sahab... aapki hauslaafzaai ke liye bahut bahut shukriya... aur islaah ke liye bhi bahut bahut shukriya...

Comment by Mohammed Arif on November 13, 2017 at 6:43pm
आदरणीय आलोक रावत जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास । मुबारकबाद क़ुबूल करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की बातों का संज्ञान लें ।
Comment by Samar kabeer on November 13, 2017 at 5:39pm
जनाब आलोक रावत जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास बहुत अच्छा हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।तो

'दिल-ए-नादान से हरगिज़ न सँभाली जाए'
सानी मिसारे में 'ऐसी'शब्द है इस लिहाज़ से ऊला यूँ होना चाहिए:-
'दिल-ए-नादाँ से जो हरगिज़ न सँभाली जाए'

दूसरे शैर में शुतरगुर्बा का दोष है,इसलिये ऊला मिसरा यूँ करना बहतर होगा:-
'जान मांगी है तो मेरी भी यही कोशिश है'

'अपने हाथों के करिश्मों पे भरोसा करके'
इस मिसरे में 'करिश्मों'लफ़्ज़ मुनासिब नहीं है,इसे यूँ कर सकते हैं:-
'अपने हाथों के हुनर पर ही भरोसा करके'
बाक़ी शुभ शुभ ।

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