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                    ग़ज़ल

इन्सां  तेरे  कदम  तक,   ये  आसमां  झुके |
मंजिल  न  हो  जहाँ,  न  वहाँ  कारवाँ  रुके ||

हस्ती है तेरी खुद में  चिरागां -ए-शब्,  सहर,

तूफां  है  तू  वो,  देख  जिसे,  हर  रवां  रुके ||

रौशन हैं तुझसे रौशनी,  के कारवाँ -ओ- दर,

मुमकिन है, तू जो चाहे, तो खुद, खुदा झुके ||

मंजिल है तेरी वो क़ि-  ज़न्नत  को  रश्क  है,

आ वो ज़हां बनायेँ,  गम न थम 
जहाँ  सके ||

हो  तुझमें ऐसी  बात,  कदम  चूम  ले 
ज़हां,
तेरे  सामने  जो  आये 'अभय' हर जुबां चुके ||

           रचनाकार- अभय दीपराज

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Comment by आशीष यादव on February 5, 2011 at 8:16am
waah, behatrin ghazal hetu badhai kabul kare sir.
Comment by Abhay Kant Jha Deepraaj on January 16, 2011 at 6:46pm
Dear friend Raju Jee & Ganesh Jee thanks for appreciation. Abhay................

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 16, 2011 at 3:47pm
बहुत ही खुबसूरत मकता निकाली है अभय जी , अच्छी ग़ज़ल हेतु दाद कुबूल कीजिये |
Comment by Raju on January 15, 2011 at 1:24pm
bahut badhiya.....

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