For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

माँ की व्यथा (लघुकथा)

एक अलसाई सी सुबह थी, सब काम निबटा कर बस बैठी ही थी मैं मौसम का मिजाज लेने। कुछ अजीब मौसम था आज का, हल्की हल्की बारिश थी जैसे आसमान रो रहा हो हमेशा की तरह आज न जाने क्यो मन खुश नहीं था बारिश को देखकर, तभी मोबाइल की घंटी बजी, दीदी का फोन था ‘माँ नहीं रही’। सुनकर कलेजा मुह को आने को था दिल धक्क, धड़कने रुकने को बेचैन, कभी कभी हम ज़ीने को कितने मजबूर हो जाते है जबकि ज़ीने की सब इच्छाएँ मर जाती है। मेरी माँ मेरी दोस्त मेरी गुरु एक पल में मेरे कितने ही रिश्ते खतम हो गए और मैं ज़िंदा उसके बगैर जिसके बगैर ज़िंदगी की कल्पना भी करना मुश्किल है, सच कहा है किसी ने, ’कोई भी इंसान अकेले कभी नहीं मरता उसके साथ मरते है बहुत सारे लोग मगर थोड़ा थोड़ा’।

माँ ने अपने अंतिम समय में एक चिट्ठी लिखी थी मुझे, उसी को खोल फिर से पड़ने लगी, आँसुओ से भीगा मेरा चेहरा बस माँ को महसूस करना चाहता था,

 

प्यारी बेटी

तुम हमेशा अपने पास बुलाती रहती हो और मैं कभी आ नहीं पाती मुझे पता है बेटा की तुम मुझसे नाराज तो नहीं होंगी पर इस बात से दुखी जरूर हो।  मैं क्या करू तुम्हारे पापा की देखभाल इतनी जरूरी है की उन्हे छोडकर आना मेरे लिए संभव नहीं, पूरी ज़िंदगी अपने सभी फर्ज़ निभाए हैं मैंने बेटा तो अब ज़िंदगी के अंतिम चरण पर उनका साथ कैसे छोडु, सोचती हूँ की अगर कल मुझे कुछ हो गया तो तुम्हारे पापा का ध्यान कौन रखेगा, पूरी उम्र ‘सुहागन रहो’ के आशीर्वाद के साथ तो कट गई, सदा सुहागन रहने के लिए हर व्रत तीज त्योहार पूरी श्रद्धा से किए मैंने पर अब सोचती हूँ की क्या मेरा सदा सुहागन रहना तुम्हारे पापा के लिए हितकर हैं। बड़ा कष्ट होता है सोचकर की मेरे बगैर वो जीवन कैसे काटेंगे, तो अब उनही के लिए ईश्वर से ये प्रार्थना करती हूँ की वो मेरे रहते ही चले जाए मेरे बाद जीवन के कष्टो से उन्हे मुक्ति मिले शायद मेरा समाज इसके लिए मुझे माफ न करे पर तुम माफ कर देना बेटा.

 

ढेर सारे स्नेह के साथ

तुम्हारी माँ

 

भीगी आंखे फिर से भर आई, पापा के प्रति माँ का प्यार उन्हे मरने से रोक रहा था। भले ही उन्हे वैधव्य का दुख सहना पड़े। वो पापा के सुख के लिए जीवन भर के संचित विश्वास और मान्यता तक छोडने को तैयार थी। यही बाते एक स्त्री को विशिष्ट बनती है।

हमारे भारतीय समाज के व्रत और त्योहारो के बारे में मैं जब भी सोचती हूँ तो मुझे लगता है की ये केवल हमारे मनोबल को बड़ाने के लिए बनाए गए है इनका कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है। मनुष्य इस दुनिया मे एक निश्चित अवधि के लिए आता है न कम न ज्यादा।हाँ मगर इन सब बातों का हमारे जीवन पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव तो अवश्य पड़ता हैं और ये हमारी भारतीय संस्कृति का अटूट हिस्सा है जिसके जड़े हमारे समाज मे बड़ी गहराई तक समाई हैं। मेरी माँ जातेजाते भी एक सीख दे गई मुझे की एक औरत का जन्म ही सिर्फ इसलिए हुआ हैं की वो अपने हर रिश्ते को पूरी ईमानदारी से जिये और उनकी खुशी पर अपनी हर खुशी को कुर्बान कर दे। 

Views: 988

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Vasudha Nigam on July 18, 2012 at 9:35am

आदरणीय राजेश कुमारी जी, इस दिशा में ये मेरा प्रथम प्रयास हैं, इसी प्रष्ठभूमि से प्रेरणा मिली है कृपया मार्गदर्शन करती रहिएगा 

धन्यवाद 

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 18, 2012 at 9:14am

उम्र के पड़ाव पर भावनात्मक प्रेम की उत्पत्ति होती है निज स्वार्थ भूलकर एक दूसरे के सुख की कामना करते हैं अद्धभुत होता है वो प्यार वही ईश्वर है वही परमेश्वर है बहुत अच्छी कहानी लिखी है कंही कंही टंकण त्रुटी है दूर कर लें 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Manjeet kaur replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"                        सभी सदस्यों को…"
4 hours ago
Manjeet kaur replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"                 दिल लगाना नहीं कि तुम से कहें,  …"
4 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"इश्क़ तो है मगर ये इतनी भी शा'इराना नहीं कि तुझ से कहें साफ़ गोई सुनोगे क्या तुम ये अहमकाना…"
12 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"एक सप्ताह के लिए सभी चार आयोजन के द्वार खुल गए। अच्छी बात ये है कि यह एक प्रयोग है ..... लेकिन…"
yesterday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई छंद ++++++++   ठंड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम  लगे सब हैं…"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"सच फ़साना नहीं कि तुझ से कहें ये बहाना नहीं कि तुझ से कहें दिल अभी जाना नहीं कि तुझ से कहें ग़म…"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"सादर अभिवादन "
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सभी की नमस्कार, यूँ तो आज आयोजन प्रारंभ ही हुए हैं और किसी प्रकार की टिप्पणी करना उचित नहीं है,…"
yesterday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
Tuesday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"स्वागतम"
Tuesday
Admin replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागतम"
Tuesday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-184
"स्वागतम"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service