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प्रश्न , एक छोटी सी बहुत बड़ी कविता — डॉo विजय शंकर

प्रश्न ये है
कि अन्तोगत्वा
हाथ क्या लगता है ?
समझ में आ जाये
तो बताइये हाथ
आपका क्या लगता है ?

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on November 9, 2019 at 5:16pm

आदरणीय विजय निकोर जी , नमस्कार , आपने रचना को मान दिया , ह्रदय से आभार। आप स्वस्थ रहें , प्रसन्न रहें और ओ बी ओ पर आते रहें , सुभेच्छू , सादर।

Comment by vijay nikore on November 9, 2019 at 7:26am

 चंद शब्दों में इतना अच्छा, इतना कुछ कह लेना... यह आपकी खूबी है। हार्दिक बधाई, मित्र विजय शंकर जी।

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 1, 2019 at 9:20pm

आदरणीय सुरेंद्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप जी , रचना आप तक पहुंचीं , आपको पसंद आई , सफल हुयी। आपका बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 1, 2019 at 6:53pm

आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी , आपने रचना में और उससे जुड़े संवादों में गहरी रूचि ली , निसंदेह सामान्य से अधिक समय दिया , आपका आभार ,रचना अपने उद्देश्य में सफल , सफलता के कोइ सौ पचास प्रमाण - पत्रों की आवश्यकता नहीं होती है , बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।

Comment by नाथ सोनांचली on November 1, 2019 at 11:17am

आद0 विजय शंकर जी सादर अभिवादन। इतने कम शब्दों में,, इतनी गहरी बात आप के हवाले से ही आ सकती है। बहुत बहुत बधाई आदरणीय। सादर

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 31, 2019 at 6:56pm

आदाब। वाह और वाह। जितना अच्छा आपकी रचना पढ़कर लगा, उतना ही अच्छा जवाबी टिप्पणियों को पढ़कर, लाभान्वित हो कर लगा। हार्दिक बधाई और आभार जनाब डॉ. विजय शंकर साहिब।

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 30, 2019 at 9:43pm

आदरणीय सुश्री उषा साहनी जी , आपने फ्रांसिस बेकन को याद किया , मेरा भी वह बहुत प्रिय लेखक है। हाँ , मुझे आपकी टिप्पणी के साथ याद आ गया कि Brevity is soul of wit ! जो मैं कभी भूलता नहीं। हम नेता तो हैं नहीं कि बोलते चलें जाएँ और सार कुछ न निकले।विश्व में बहुत बड़ी बड़ी बातें तो कुछ शब्दों में कहीं गई हैं , प्रकृति तो कुछ भी नहीं बोलती पर हमें हमारा सारा ज्ञान इसी प्रकृति से मिलता है। हाँ , हमें महसूस करना आना चाहिए।
आभार और धन्यवाद , सादर।

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 30, 2019 at 9:21pm

आदरणीय समर कबीर साहब, नमस्कार , आपका बहुत बहुत आभार रचना कितनी भी छोटी क्यों न आपकी पैनी दृष्टि से छुप नहीं पाती , न स्वरुप से न भावार्थ से। बहुत बहुत आभार और धन्यवाद। सादर।

Comment by Usha on October 29, 2019 at 12:37pm

आदरणीय डॉ वियज शंकर सर, आपने "फ्रांसिस बेकन" की तरह कई सारी बातों को इतने कम शब्दों में बड़ी ख़ूबसूरती से अभिव्यक्त किया है। बधाई स्वीकार करें सर। सादर।

Comment by Samar kabeer on October 28, 2019 at 3:51pm

जनाब डॉ. विजय शंकर जी आदाब,कमाल है साहिब,कम शब्दों में बड़ी बात कहना कोई आपसे सीखे,बहुत ख़ूब, वाह, इस शानदार प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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