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अकेलापन —डॉo विजय शंकर

जिंदगी जीने का मौक़ा ,
भीड़ से निकल कर मिलता है ,
माहौल कुछ इस कदर
असर करता है।
अकेले हों तो ख़ुद से बात
करने का मौक़ा मिलता है l
भीड़ में तो आदमी बस
दूसरों की सुनता है।
हर आदमी कोई न कोई
सवाल लिए मिलता है ,
आपको अपनी सुनाता है ,
फिर भी आपके जवाब
को कौन सुनता है ?
शायद इसीलिये अकेलापन
आपको बहुत कुछ सीखने
समझने का मौक़ा देता है।
जिंदगी जीने का मौक़ा तो
भीड़ से निकल कर ही मिलता है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on November 8, 2019 at 7:28pm

आदरणीय फूल सिंह जी , कविता स्वीकृति प्रदान करने के लिए आभार एवं बधाई के लिए ह्रदय से धन्यवाद , सादर।

Comment by PHOOL SINGH on November 8, 2019 at 12:59pm

डॉ साहब बहुत सुंदर रचना बधाई स्वीकारे

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 8, 2019 at 8:03am

आदरणीय लक्ष्मण धामी “मुसाफिर” जी , कविता स्वीकर करने के लिए आभार एवं बधाई के लिए ह्रदय से बहुत बहुत धन्यवाद , सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 8, 2019 at 7:10am

आ. भाई विजय जी, अच्छी प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 8, 2019 at 7:05am

आदरणीय सुरेद्रनाथ सिंह जी , कविता स्वीकर करने के लिए आभार एवं बहुत बहुत धन्यवाद , सादर।

Comment by नाथ सोनांचली on November 7, 2019 at 10:54pm

आद0  डॉ. विजय शंकर जी सादर अभिवादन। बढ़िया प्रस्तुति है। इस रचना के बाबत आद0 अग्रज समर साहब के बातों से मैं भी सहमत हूँ। बधाई स्वीकार कीजिये। सादर

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 7, 2019 at 9:20pm

आदरणीय समर कबीर साहब, नमस्कार , आपकी प्रतक्रिया इसी लिए तो प्रतीक्षित रहती है कि कहीं भी कुछ क्षीणता हो आप न केवल पकड़ लेते हैं , सुझाव भी सुन्दर देते हैं , बहुत बहुत आभार , आगे से पूरा ध्यान रखूँगा। कविता स्वीकृति प्रदान करने के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।

Comment by Samar kabeer on November 7, 2019 at 11:48am

जनाब डॉ. विजय शंकर जी आदाब,कविता का मफ़हूम अच्छा है,लेकिन हर दूसरी पंक्ति में 'है' का दुहराव कविता को कमज़ोर कर रहा है,मुझे इस कविता में आपका ख़ास अंदाज़ देखने को नहीं मिला, हो सकता है ये मेरी अपनी सोच का नतीजा हो,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 5, 2019 at 9:36pm

आदरणीय सुशील सरना जी , रचना को स्वीकार कर मान देने के लिए एवं बधाई के आभार एवं धन्यवाद , सादर।The 

Comment by Sushil Sarna on November 5, 2019 at 4:56pm

वाह आदरणीय डॉ विजय शंकर जी वाह , बहुत खूब .. अकेलेपन की व्यथा को चित्र्ति करती अति सुंदर रचना। दिल से बधाई।

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