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हवा में - डॉo विजय शंकर

हमने एक मकान बनाया ,
सबसे पहले
छत को बनाया ,
चढ़ कर उस पर
उछले-कूदे ,
खूब चिल्लाये ,
नाचे- गाये ,
देख आसमान ,
खूब इतराये ,
लगा , लपक कर
छू लेंगें ,
मुठ्ठी में नभ कर लेंगें ,
और जब नीचे झाँका , देखा ,
अचानक तब घबराये ,
हा , बुनियाद ,
कहाँ छोड़ आये।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on October 24, 2017 at 2:59pm
आली जनाब डॉ.विजय शंकर जी आदाब,एक लफ़्ज़ को बुनियाद बनाकर आपने कितनी गहरी और सच्ची बात कह दी,आज के दौर की या यूँ कहें कि हमारी सबसे बड़ी नाकामी की वजह यही है कि हम अपनी बुनियाद को भूल गए हैं,और ऊंचाई छूने को बेताब हैं,बहुत ख़ूब वाह, आपकी कविताएं मुग्ध कर देती हैं,इस शानदार प्रस्तुति पर दिल से ढेरों बधाई स्वीकार करें ।

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