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क्यों कहते हो कुछ नहीं हो सकता है--- डॉo विजय शंकर

तुम बता रहे हो ,
मैं जानता हूँ , कुछ नहीं हो सकता ,
सदियों से झेलते आ रहे हैं ,
कुछ हुआ , अचानक अब क्या हो जाएगा।
पर , आओ हम कहें , तुम कहो , सब कहें कि
कुछ नहीं हो सकता , तय तो कर लें कि
क्या कुछ हो नहीं सकता।
वो जो पुरोधा बन के बैठे हैं ,
वह भी यही कह रहें हैं ,
वैसे वो जो चाहतें हैं , वह सब हो जाता है,
भाव बढ़ जाते हैं , मंहगाई बढ़ जाती है ,
उनकीं तारीफ़ , यशोगान हो जाता है ,
बस यही नहीं हो पाता है ,
हम ही दुनिया में अनूठे हैं
जो विपत्तियों आपदाओं से
लड़ते नहीं , समझौता करते हैं ,
उन्हें नियति बता देते हैं , मान लेते हैं ,
नीयत शून्यता कहें इसे या सामर्थ्य - अभाव ,
एक क्षीण , अन्यथा लाचार, व्यवस्था को झकझोर देता है ,
हम कहते हैं , कुछ हो नहीं सकता।
स्वयं सुरक्षा करो, घर में रहो, सुरक्षित रहो ,
नहीं कोई अप्राकृतिक न्याय कर जाएगा ,
वीभत्स दंड दे जाएगा , क्या करोगे ,
क्योंकि , कुछ हो नहीं सकता ।
सोचो , क्या कर सकते हो , कुछ कर सकते हो ,
या सिर्फ बैठे बैठे किसी राम या कृष्ण की प्रतीक्षा करते हो,
वो आएंगे , फिर एक रावण का संहार होगा , कंस मिटेगा ,
मानते हो , फिर क्यों कहते हो , कुछ नहीं हो सकता है।

मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

Views: 717

Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on March 10, 2015 at 12:11pm
आदरणीय डॉo गोपाल नारायण जी , विशवास स्वयं कुछ करने से ही उत्पन्न होता है , कुछ करने के लिए तमाम शक्ति , सामर्थ्य के साथ नीयत की भी जरूरत होती है ,
नीयत न हो तलवार और बंदूक भी धरी रह जाती है। नीयत , इरादे , हौसले या इच्छा - शक्ति हो तो सब कुछ हो सकता है। आपने भी देखा होगा , मैंने भी देखा है। आपकी विवेचना हेतु ह्रदय से आभार , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 10, 2015 at 12:01pm
आदरणीय श्याम मठपाल जी , लंका किसी की भी हो , ढहती ही है , ढहाने वाला भी हमारे बीच से ही आता है, आपकी विवेचना मूलयवान है , आपका आभार। आपकी सद्भावनाओं के लिए ह्रदय से धन्यवाद , सादर।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 10, 2015 at 11:49am

आ० विजय सर i

कुछ हो नहीं सकता क्योंकि मुझे न खुद पर  विशवास है  न आप पर i यह विश्वास  कैसे बने i मूल समस्या यही है  i हां कुछ भी हो सकता है समुद्र में पुल भी बन सकता है   i पर इतना आत्म विश्वास तो हो  i सादर i

Comment by Shyam Mathpal on March 10, 2015 at 9:59am

Aadarniya Dr.Vijay shankar Ji,

Samayik wa sargarbhit rachna ke liye sadhuwad. Badhai.

Aaj ke iss daur main shayad  phir koi bhudh, mahavir ya nanak peda hoga

Iss Gahan Andhkar main nahee roshni Roshani Dega.

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 10, 2015 at 9:38am
आदरणीय मोहन सेठी ' इंतज़ार ' जी आपकी विवेचना को सादर नमन , आपकी सद्भावनाओं हेतु ह्रदय से आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 10, 2015 at 5:23am

आदरणीय आप ने सही कहा ...क्यों नहीं हो सकता? .... मैं मनाता हूँ क्रांति रचनाकारों से ही शुरू होती है ...बधाई स्वीकार करें ...सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 10, 2015 at 12:14am
आदरणीय कृष्ण मिश्रा जी, आपकी संवेदनशीलता को नमन ,आपकी विवेचना का स्वागत है,आभार एवं बहुत बहुत धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 9, 2015 at 11:20pm
आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी, आपकी सद्भावनाओं हेतु , आपको सादर।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 9, 2015 at 11:20pm

अहा!! कालजयी रचना !!मुक्तिबोध जी की कवितओं का ओज आँखों में आ गया!!बहुत खूब!!इस रचना पर आपको नमन आ० विजय शंकर जी!

Comment by Hari Prakash Dubey on March 9, 2015 at 11:00pm

सर, आपका आशीर्वाद हमेशा बना  रहेगा ,इसी कामना के साथ पुन: आपकी लेखनी को नमन ! सादर 

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