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प्रकृति का संगीत है पर्यावरण ,
वनसम्पदा का प्रतीक पर्यावरण |
कोयल की कूक,पंछी की चहक,
फूलो की महक,झरनों की छलक ,
रंगीं धरती का गीत है पर्यावरण |
प्रदूष्ण ने फैलाया है जाल ,
लिपटी धरा उसमें है आज
बचाना है धरती का आवरण |
कटे पेड़ों से बिगड़ा आकार ,
चहुँ ओर फैला है हाहाकार ,
टूटें तार ,सुना है पर्यावरण |
आओ मिल लगायें नये पेड़ पौधे ,
सूनी धरा में खुशियाँ नई बो दे ,
नये स्वर बनाएं रंगीं पर्यावरण |

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Comment by rajesh kumari on May 13, 2012 at 12:23pm

बहुत अच्छे भावों से परिपूर्ण सुन्दर सन्देश देती हुई रचना बधाई रेखा जी 

Comment by आशीष यादव on May 13, 2012 at 12:23pm

पर्यावरण पर अच्छी रचना।
बधाई

Comment by Nilansh on May 13, 2012 at 9:21am

bahut acchae vishay par accha likha aapne

Comment by Bhawesh Rajpal on May 13, 2012 at 9:14am
एक  टीस  सी उठती है मन में , हमारी धरती माँ का ये हाल देख कर , प्रदूषण के कारण जन- जीवन  बेहाल देख कर !
जागृत होना होगा हम सब को ,  जीवन-दायिनी धरा की रक्षा हेतु, वृक्ष लगाना , जल प्रदूषण रोकना , अवैध खनन का विरोध !
संसाधनों का अल्प व् समुचित उपयोग , आदि  !
बहुत सुन्दर  चेतावनी !  बहुत-बहुत बधाई आदरणीय रेखा जोशी जी !

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