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दूर दामन से तेरे गर्दिश-ए-अय्याम रहे - SALIM RAZA REWA

2122 1122 1122  22/112

ये हमारी है दुआ शाद तू गुलफा़म रहे

दूर ही तुझसे सदा गर्दिश-ए-अय्याम रहे
-
सारी दुनिया में तेरे इल्म की महके ख़ुश्बू
जब तलक चाँद सितारें  हों तेरा नाम रहे
-
इस तरह तेरे तसव्वुर में मगन हो जाऊँ
मुझको अपनों से न ग़ैरों से कोई काम रहे
-
जब तेरी दीद को हम शहर में तेरे पहुंचें
अपने दामन से न लिपटा कोई इल्ज़ाम रहे
-
तेरी ख़ुशहाली की हरपल ये दुआ करते हैं 
तेरे  दामन  में  ख़ुशी  सुब्ह रहे शाम रहे 
-
हर क़दम मेरा उठे तेरी रज़ा की ख़ातिर
मेरे  होंटो  पे   हमेशा  तेरा  पैगाम  रहे
_________________
मौलिक एवँ अप्रकाशित

_________________________

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on February 1, 2018 at 5:33pm

आदरणीय सलीम रज़ा साहब आदाब,

                         बहुत अच्छे अश'आरों से सजी बेहतरीन ग़ज़ल । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की इस्लाह पर तत्काल प्रभाव से अमल करें तो ग़ज़ल में और निखार आ सकता है ।

Comment by Samar kabeer on February 1, 2018 at 3:08pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

मतले का सानी मिसरा कमज़ोर है, बदलने का प्रयास करें ।

दूसरे शैर के सानी मिसरे में 'सितारों' की जगह "सितारे" कर लें ।

4थे शैर के ऊला मिसरे में 'पहुंचे' को " पहुंचें" कर लें ।

5वें शैर के ऊला मिसरे में 'ये' की जगह " ही" कर लें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 29, 2018 at 3:39pm

भाई सलीम जी , ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई

Comment by vijay nikore on January 28, 2018 at 2:43pm

गज़ल अच्छी लगी। हार्दिक बधाई, आ० सलीम रज़ा जी।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 26, 2018 at 4:36pm

बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल कही आदरणीय…सभी शेर खूबसूरत

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 26, 2018 at 5:55am

बेहतरीन ग़ज़ल। तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब सलीम रज़ा 'रीवा' साहिब।

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