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१२ मार्च की काव्य-गोष्ठी : एक रिपोर्ट // --सौरभ

साहित्य का संसार रचनाओं के पठन-पाठन के अलावे सद्साहित्य के संसरण और इसी क्रम में इसके संवर्धन के कार्य की अपेक्षा करता है. साहित्यिक गोष्ठियाँ या अदबी नशिश्त इस कार्य हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण इकाइयाँ हैं. आत्मीय माहौल में रचनाकार की रचनाओं को सुनना तथा उन रचनाओं से जुड़े अन्य तमाम पहलुओं को उन रचनाकारों से सुनना अक्सर सामुदायिक कार्यक्रमों या आयोजन में न संभव हो पाता है न इसका वहाँ उचित वातावरण ही होता है.

शहर की गोष्ठियों और सम्मेलनों में शिरकत करते रहने के क्रम में कई सुखनवर, कई साहित्यिक सज्जनों से आत्मीय रिश्ता-सा बन गया है. इन सुधीजनों का साहित्य के प्रति अनुराग न केवल चकित करता है बल्कि उनका व्यक्तिगत समर्पण हिन्दी-उर्दू जैसे वर्गों-अनुवर्गों को खुल्लमखुल्ला नकारता हुआ आम जन की बोलचाल की भाषा को अपना हेतु समझता है, जहाँ आम जन का सुख, दुख, व्यवहार, भरोसा, रिश्तों की कश्मकश और उत्साह स्वर पाता है.

कहते हैं, विचारों की नींव पर बना रिश्ता अन्य किसी नींव पर बने रिश्तों से कहीं अधिक स्थायी और सार्थक होता है.


वीनसभाई का मुझे इसी महीने की ९ तारीख की सायं फोन पर ये सूचना देते हुए कहना कि विवेक मिश्र सोलन (हिप्र) से १२ मार्च को नैनी, इलाहाबाद में होंगे क्यों न इस क्रम में नैनी स्थित मेरे आवास पर एक अनौपचारिक काव्य-गोष्ठी का आयोजन हो जाय. समझिये तो बातें भले वीनसजी की थीं, लेकिन मेरे सोचे को ही स्वर मिल रहा था ! एक अरसे से मेरी  इच्छा थी कि इलाहाबाद के आत्मीय सुधीजनों की सात्विक उपस्थिति से अपने आवासीय वातावरण को कभी तरंगित करने के अवसर पाता.  अतः, इससे पहले कि वीनसजी की बात पूरी होती, मैंने एकदम से हाँ कर दिया. साथ ही, यह भी जड़ दिया कि वे इस नितांत पारिवारिक वातावरण में आयोजित कार्यक्रम हेतु आत्मीय जनों को सूचित कर दें और कुछ अपनों को मैं सूचित कर दूँगा. 

१० मार्च को महाशिवरात्रि के अवसर पर गंगा-स्नान, पूजा-अर्चन और उपवास के बाद ११ मार्च को लोगों को सूचित करने का क्रम प्रारंभ हुआ. कई-कई विन्दुओं के आलोक में कवियों और ग़ज़लकारों के नामों पर चर्चा कर मैं और वीनसजी ने कुछ नामों पर अपनी परस्पर सहमति कायम की. १२ मार्च को गोष्ठी का समय सायं चार बजे नियत हुआ ताकि वह साढ़े चार तक प्रारंभ हो जाय.


समयानुसार वीनसभाई, फ़रमूद इलाहाबादी, तलबजौनपुरी, रमेश नाचीज़, विवेक मिश्र, शक्तीश सिंह, प्रो. कर्णाकान्त तिवारी, प्रो. विभाकर डबराल, घनश्यामजी, अश्विनी कुमार, शुभ्रांशु पाण्डेय और मैं हाल में उपस्थित हो गये. कुछेक अपेक्षित कवि और ग़ज़लकार कतिपय व्यक्तिगत कारणों से चाह कर नहीं आ पाये, जिनकी कमी सभी ने महसूस किया. वीनसजी ने संचालन का दायित्व स्वीकार किया तथा गोष्ठी की अध्यक्षता के लिए तलबजौनपुरी का नाम सहर्ष अनुमोदित हुआ. सामुहिक तौर पर यह सर्वमान्य हुआ कि प्रस्तुतकर्ताओं पर सिर्फ़ एक रचना या एक ग़ज़ल की बंदिश न लगायी जाय. बल्कि रचनाकार तीन से चार रचनाएँ या ग़ज़ल प्रस्तुत करें. इसके अलावे श्रोताओं के अनुरोध पर रचनाकार-कवि इस संख्या के आगे भी जा सकते हैं.


कार्यक्रम फ़रमूद भाई की हास्य-ग़ज़लों सेशु्रु हआ. फ़रमूद भाई अपनी चुटीली और हास्य ग़ज़लों के लिए इलाहाबाद ही नहीं राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुशायरों में आज जाने-माने नाम हैं. बेशक कहा जा सकता है कि आपने इलाहाबाद में अकबर इलाहाबादी की परिपाटी और उनके अंदाज़ के परचम को बखूबी संभाला हुआ है. आपकी हास्य ग़ज़लों का प्रस्तार वास्तव में अत्यंत व्यापक है.
आपने हास्य ग़ज़ल प्रस्तुत करते हुए उनके पीछे की घटनाओं का भी दिलचस्पघटनाएँ सुनायीं इससे प्रस्तुतियों का असर दूना होगया था.


काश गर्मी के महीनों में भी जाड़ा होता
तो शबेवस्ल का मेरी यों न कबाड़ा होता
कैस ने फाड़ लिये जोशेजुनूं में कपड़े
पैरहन हमने तो लैला का ही फाड़ा होता


या,
रटता आया रट्टू तोता आता जाता कुछ नहीं
बना है ’अकबर’ का पोता आता जाता कुछ नहीं.. 


आपकी ग़ज़लों के बाद तो महफ़िल एकदम से परवान चढ गयी. ’अकबर’ का संदर्भ इतना सटीक था कि हँसते-हँसते श्रोतागण के दोहरे हो गये.


फ़रमूद भाई के बाद घनश्यामजी ने अपनी एक ग़ज़ल और कतिपय दोहे छंदों से सभी का मन जीत लिया. घनश्याम जी का साहित्यानुराग प्रशंसनीय ही नहीं अनुकरणीय भी है. आपके दोहे पूरी तरह से छंद शिल्प और कथ्य के तथ्य को संतुष्ट करते हैं.  आपके दोहों का कथ्य इतना व्यापक और आधुनिक परिवेश से उपजे मानवीय कश्मक को सस्वर करता हुआ था कि सभी उपस्थित सुधीजन वाह-वाह कर उठे.


रोजी-रोटी के लिए, भटक रहे हैं लोग
कहने को तो है यहाँ, बड़े-बड़े उद्योग ॥


शुभ्रांशुजी हास्य की गद्यविधा में तेज़ी से उभरते हुए नाम हैं. आपकी शैली चुटीली तथा किस्सागोई अत्यंत मुखर है. गद्य-हास्य ’खाली ज़मीन’ में आपने आज की आवासीय कॉलोनियों में नवधनाढ् दबंगों की ’हड़पाऊ’ संस्कृति पर ग़ज़ब का वार किया है. आपकी लेखन क्षमता का लोहा एक तरीके से सभी ने माना.

विवेक मिश्रा ने अपनी एक प्रखर ग़ज़ल से उपस्थित समुदाय को चकित कर दिया. आपके लगभग सभी अश’आर ग़ज़ब कर रहे थे !

 
एक मुसलसल जंग सी जारी रहती है --
जाने कैसी मारा मारी रहती है ॥
इक ख्वाहिश की ख़ातिर ख़ुद को बेचा था
अब तक शरमाई, खुद्दारी रहती है ॥

कहना न होगा, विवेक ने इस ग़ज़ल की सोच और शेरों के अंदाज़ पर खूब वाहवाहियाँ बटोरीं.


प्रो. करुणा कात तिवारी ने सरकारी मौसम विभाग को इंगित कर बहुत सटीक हास्य कविता पढी.
तूफ़ान से पीड़ित महिला ने कहा
खबर भी सुनी थी
और जान भी प्यारी थी
पर विश्वास नहीं हुआ
क्योंकि खबर सरकारी थी. ..

वीनस केसरी ने अपनी ग़ज़लों से समा को ऐसा बाँधा कि माहौल अश-अश कर उठा.

 

शाम ढलते उतर रहा होगा
जो कभी दोपहर रहा होगा ॥
मंज़िलें जैसे तंज हों मुझपर
सोचिये क्या सफ़र रहा होगा ॥

या,
खुद को समझे बिन किसी को क्या समझ पाऊंगा मैं,
इसलिए अब खुद से खुद का इक सफ़र मेरा भी है |

या,

मैंने पल भर झूठ-सच पर तब्सिरा क्या कर दिया,
रख गए हैं लोग मेरे घर के बाहर आइना |





प्रस्तुत रिपोर्ट का लेखक इस ख़ाकसार ने भी जो बन सका प्रस्तुत किया जिसमें फ़ागुनी दोहों और दो-एक ग़ज़लों का पाठ पसंद किया गया.


फगुनाई  ऐसी  चढ़ी,  टेसू धारें आग
दोहे तक तउआ रहे, छेड़ें मन में आग॥

बोल हुए मनुहार से, आकुल मन तस्वीर
मुग्धा होली खेलती, गद-गद हुआ अबीर ॥


या, ग़ज़ल -
सूरज भले पिघल कर बेजान हो गया है ।
इस धुंध में अगन है.. तूफ़ान पल रहा है ॥


ग़र खंडहर चिढ़े हों ख़ामोश पत्थरों से  
ये मान लो कि जुगनू को ख़ौफ़ रात का है !!

सुधीजनों की उदार हौसलाअफ़ज़ाई के हम सदा आभारी रहेंगे.  अपनी रचना ’पान-सुपारी..’ का भी हमने पाठ किया, जिस हेतु सभी सुधीजनों की विशेष मांग थी. 



रमेश नाचीज़ ने फागुनी दोहों के अलावे ग़ज़लें भी कहीं जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा हुई.
लिक्खो ज़िन्दाबाद लिखो
भगतसिंह आज़ाद लिखो
भ्रष्टाचार में देश अपना
है तो है उस्ताद लिखो
अदबी राजधानी में लोगो
लिखो, इलाहाबाद लिखो


यह अवश्य था कि आपके इन फागनी दोहों का उन्मुक्त हुलास सभी को तिर्यक मुस्कानों में लिपटी परस्पर कनखियों से देखने को बाध्य कर रहा था. बाद में, माहौल ’बुरा न मानों होली है’ करता हुआ आगे बढ़ गया.


अध्यक्षता कर रहे तलबजौनपुरी साहब की ग़ज़लों का अपना एक अलग अंदाज़ है. आप अपनी ग़ज़लों में फ़लसफ़ाना फ़िक़्र को बड़ी काबिलियत से पगाते हैं.

महारत हमको हासिल ’तलब’ मर्दुम शनासी में -
मुखौटे तुम लगाओ लाख हम पहचान लेते हैं ॥



अल्पाहार में जो कुछ बन पड़ा नीचे रसोई से उपलब्ध कराया गया.

गोभी के, प्याज के, साबुदाना-आलू के गर्मागर्म पकौड़ों का मनोहारी स्वाद, इमली की चटनी का खटमिट्ठापन, भरवां कचौरियों का खास्तापन, पुदीने की चटनी का चटखारापन , मसालेदार खास्ता मठरियों मुँह में जाते घुलते जाना, कलाकन्द की मुलायम मधुरता बार-बार खाली होते प्लेटों को खाली न रहने देने को बाध्य करतीं रही. आखीर में गर्मागर्म फेनिल कॉफ़ी का स्वागत तो यों हुआ मानों सारी जिह्वाएँ और सारे कण्ठ तर होने को आतुर बैठे हों. 

यह सारा कुछ घरेलू रसोई के ही सौजन्य से था.  इन प्रस्तुतियों में माताजी के स्नेहिल स्पर्श तथा स्नेहाशीष और बहुओं की संलग्नता तथा भावमय समर्पण को सभी ने महसूस किया.

सायं आठ बजे तक चली इस काव्य-गोष्ठी ने उस रोज़ की सध्या को लगभग बाँधे रखा था. गोष्ठी पर अश्विनीकुमार और प्रो. विभाकर डबराल ने अपने-अपने मंतव्य दिये. इस आयोजन की सफलता को सभी ने मुखर रूप से स्वीकारा.

**************

--सौरभ

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ये विवेक को बुलावा है या उन सभी को इशारा जो कतिपय कारणों से नहीं आ पाये... .  :-D)))

कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना. :D

विवेकजी, हमने तो कुछ प्रस्तुतियों की दो-तीन पंक्तियाँ दे कर इशारे भर किये हैं..   आपने तो अन्यान्य प्रस्तुतियों की पंक्तियाँ साझा कर पाठकों के मन आग ही लगा दिया है. .. हा हा हा.. .

आदरणीय गुरुदेव् सादर प्रणाम

सबसे पहले तो आपको बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रिपोर्ट को बनाने हेतु

आगाज से अंजाम तक

एक एक प्रस्तुति मंत्र मुग्ध देती है

इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है के क्या माहौल रहा होगा

चित्रकूट के घाट में भाई संतन की भीड़

ऐसे अनुपम मिलन बड़े सौभाग्य से हुआ करते हैं

आप सभी को बहुत बहुत बधाई हो इस सुन्दर काव्य गोष्ठी हेतु

चित्रकूट नाहीं भइया,  ई जोग जुटा रहा यमुना-संगम के दक्खिन नैनी में ... :-)))))

सौरभ जी, फोटो और रचनाओं की झलकियाँ ... और साथ में आपका चिरपरिचित अंदाज़े बयाँ ....

इस रिपोर्ट ने गोष्ठी को जीवंत कर दिया है 

दो सत्रों में स्पष्ट विभाजित इस गोष्ठी का पहला सत्र मानसिक और दूसरा सत्र जिह्वा को प्राण संतुष्ट करता गया :))))))

आगे भी ऐसी दो सत्रीय गोष्ठी का आयोजन होता रहे .... आमीन 

आमीन तो साथ-साथ हम भी कहें .. कि, पहला सत्र तो अपने हाथ है ..  अलबत्ता,  दूसरे सत्र के लिए पहले अग्रिम-आवेदन करना होगा, अनुमोदित हुआ तो सोचा भी जा सकता है, वर्ना.. हाथ में समोसा क्या बुरा है ... . :-))))

हा हा हा हा.. . .

वर्ना.. हाथ में समोसा क्या बुरा है ... . :-))))

are ... ha ha ha 

/ दूसरा सत्र जिह्वा को प्राण संतुष्ट करता गया /
अब मैं समझा.. ये पकौड़ियों का ही जोश था कि बार-बार "हमका का - हमका का" निकल रहा था. :))))

हा हा हा
आपका विचार उच्च हैं :)))))))))

ham padh kar hi raspan kar le rahe hain. badhai sabhi rachnakaron ko .aadarniy saurabh ji ko is khas peshkash ke liye

 

आदरणीय सौरभ जी आपकी इस काव्य गोष्ठी का प्रस्तुतिकरण इतना बेहतरीन है कि पढ़ते पढ़ते लगा कि मैं भी उस गोष्ठी में उपस्थित थी बहुत ही रोचक वर्णन किया है आपने सभी कवियों की रचनाये कबीले तारीफ है ऐसी गोष्ठियों में आनंद के साथ साथ बहुत कुछ सीखने को मिलता है साहित्यिक सेवा में इस सराहनीय सफल आयोजन हेतु आप को व वीनस जी को हार्दिक बधाई|

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