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ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा अंक ३० की सभी गज़लें एक साथ

Saurabh Pandey 

हर दरिन्दे के कयासों को ज़बर करती है
हाँ, निग़ाहों की असमता ही कहर करती है ॥१॥

खूब दावा कि उठा लेंगे ज़माना सिर पे
हौसला पस्त हुई बात मग़र करती है ॥२॥

मोमबत्ती लिए लोगों के जुलूसों में भी
दानवी भूख कई आँखों में घर करती है ॥३॥

ये कहाँ सच है कि रेतों में नमी ही दोषी
रेत सूखी भी रहे जान दुभर करती है ॥४॥

जो न मरती है न जीती है, सुनो, वो औरत
बेहया काठ सी बस उम्र गुज़र करती है ॥५॥

ज़र्द आँखों की ज़ुबां और कहो क्या सुनता
शर्म वो चीज़ है, ऐसे में असर करती है.. ॥६॥

हालिया दौर में बेटी के पिताओं की हर
रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है ॥७॥

शह्र के ज़ब्त दरिन्दों में है वो शातिर भी
गाँव में एक, खुली माँग सँतर करती है ॥८॥


जबर= भारी, शक्तिशाली ज़र्द=पीला

फसले गुल जब कभी गुलशन पे नज़र करती है l
गुन्चे गुन्चे की महक दिल पे असर करती है ll

जीस्त तन्हाई के सहराओं में तपती है मगर l
रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है ll

तुम ने सोचा है कभी हम तो यही कहते है l
मुनफ़रिद हो कोई ख़ुशबू तो असर करती है ll

काम से लौट के जब शाम को घर आता हूँ l
लहर बच्चों में मसर्रत की गुज़र करती है ll

भूल जाता है जब इंसान इबादत तेरी l
फ़िक्र दुनिया की उसे ज़ेरो ज़बर करती है ll

मैं जो ठहरूं भी किसी मोड़ पे क्या फर्क कोई l
मेरी तख़ईल तो हर सम्त सफ़र करती है ll

मर के जीता है ये इन्सां कभी सोचा "गुलशन" l
आती जाती हुई हर सांस खबर करती है ll

जीस्त=जिंदगी, मसर्रत= खुशी, मुनफरिद=बेजोड, जेरो ज़बर= अस्त व्यस्त,  तख़ईल=ख्याल, सोच, सम्त=दिशा

ऐश  इनकम पे  मेरी  शामोसहर करती है
बैंक बैलेंस को पल भर में सिफर करती है  |1|

मैंने बाइक भी नहीं बदली कई सालों से
वो हमेशा यूँ ही ए सी में सफर करती है  |2|

भाँप  के  उसके  इरादे  मैं  काँप  जाता हूँ
जब मेरी ओर कभी तिरछी नज़र करती है  |3|

जानती  है  कि ये है मोम पिघल जाएगा
झील-सी आँख तुरत अश्क़ से तर करती है  |4|

मेरी  हिंदी  तो जुबां से न निकल पाती है
जब भी अंग्रेजी में वो चटर-पटर करती है  |5|

शौक है खर्च का दौलत भी लुटाती है बहुत
खूब लड़ती  है  मुझे प्यार मगर करती  है  |6|

धूप  में  रूह  मेरी,   दिन गुजार लेती है
रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है  |7|

शामो सहर=सुबह शाम, सिफर=शून्य, अश्क=आंसू

जब दुआ कोई फकीरों की असर करती है
एक तिनके को वो पल भर में शज़र करती है

वो मेरे साथ रहे या न रहे फर्क नहीं
मेरी तन्हाई मेरे साथ सफर करती है

सारी दुनिया से अगर जीत भी जाएँ तो क्या 
हमको तो क़त्ल फकत एक नज़र करती है

एक अफ़साने का किरदार बनाकर मुझको
बेसबब सारे ज़माने को खबर करती है

कब रुलाना हैहंसाना है उसे सब है पता
जिंदगी काम यही शामो सहर करती है

रात की देह बड़ी सख्त हुई है जबसे
रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है

शज़र=वृक्ष, फकत=मात्र, अफ़साना=कहानी, बेसबब=बिना कारण के, 
 


वॊ दुआयॆं मॆरॆ वास्तॆ शामॊ-सहर करती है ॥
बॆशक मॆरी मुशीबतॊं कॊ बॆअसर करती है ॥१॥

कॊई शक हॊ तुम्हॆं,तॊ आज़मा कॆ दॆख लॊ,
माँ की दुआ दवा सॆ पहलॆ असर करती है ॥२॥

लौट कर घर पहुँचता नहीं मैं जब तलक,
इन्तज़ार मॆरा वॊ जाग-जाग कर करती है ॥३॥

ज़रा भी ना-साज़ हॊ,तबियत औलाद की,
रात अंगारॊं कॆ बिस्तर पॆ बसर करती है ॥४॥

डांट दॆती है कभी मुझकॊ गुस्सॆ मॆं अगर,
पछतावा भी फिर वही रात भर करती है ॥५॥

तंग आकॆ मॆरीबदमाशियॊं सॆ रॊ दॆती है,
कहती कुछ नहीं वॊ,हॊंठ थर-थर करती है ॥६॥

लाख कॊशिशॊं करॆ कॊई झूठ छुपता नहीं,
मुआयना कुछ ऎसा,उसकी नज़र करती है ॥७॥

ख्वाहिश औलाद की हॊ भलॆ कितनी बड़ी,
पूरी हर-हाल मॆं उसकॊ माँ मगर करती है ॥८॥

नॆकियॊं का पैग़ाम दॆती हमॆशा औलाद कॊ,
मुनासिब कामयाबी की हर डगर करती है ॥९॥

"
राज" लाखॊं सज़दॆ करूं कदमॊं मॆं उसकॆ,
मॆरी खुशियॊं कॆ वहीखड़ॆ सज़र करती है ॥१०॥

नासाज़=गडबड, मुनासिब=ठीक 


दिल्लगी यार की बेकार हुनर करती है,
मार के चोट वो गम़ख्व़ार फ़िकर करती है, 

 
इन्तहां याद की जब पार करे हद यारों,
रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है,

आरजू है की तुझे भूल भुला मैं जाऊं,
चाह हर बार तेरी पास मगर करती है,

देखने की तुझे न चाह न कोई हसरत,
माफ़ करना जो ये गुस्ताख नज़र करती है,

मुश्किलें दूर कहीं छोड़ मुझे ना जाएँ,
जिंदगी मौत के कदमो पे सफ़र करती है,

सामने प्यार बहुत और बुराई पीछे,
इक यही बात तेरी दिल पे असर करती है.

      
       गमख्वार=सहानुभूति करने वाला

मौत को दूरमुसीबत बेअसर करती है,
गर दुआ प्यार भरीसाथ सफ़र करती है,

जान लेवा ये तेरीशोख़ अदा है कातिल, 
वार पे वारकई बार नज़र करती है, 

देख के तुम न डरोतेज हवा का झोंका,
राज की बात हवादिल को खबर करती है, 

फासले बीच भलेलाख रहे हों हरदम,
फैसला प्यार कातकदीर मगर करती है,

जख्म से दर्द मिलेपीर मिले चाहत से, 
प्यार की मार सदाघाव जबर करती है,

जब बुढ़ापे काखुदा दे के सहारा छीने,
रात अंगारों केबिस्तर पे बसर करती है...

बात जब भी हो सलीके से तो घर करती है,
अच्छे-अच्छों के वो जेहन में असर करती है।

हमने देखा है यहाँ लोकतंत्र के घर में,
सियासत,हुक्मरां के साथ डिनर करती है!

बात उठती है जहाँ भी ये शाने-औरत पे,
शर्म भी शर्म से यूँ नीची नज़र करती है।

जिनकी नस नस में लहू करता है बाँकी बातें,
वही कौमे तो यार बढ़ के ग़दर करती है।

कोई भी हस्ती हो वो रह नहीं सकती कायम,
जाने-अनजाने जब वो बात लचर करती है।

होगी जब सुबह तो सब कुछ ही सुहाना होगा,
रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है।

जेहन=मष्तिष्क, शाने औरत= औरत की शान, हुक्मरां=शासन करने वाला

वक़्त की आंधियाँ जब भी यूँ कहर करती है,
देखते - देखते वो  दर  से  बदर करती  है।
कितनी तेजी से ये चलती है हवा फैशन की ,
गावों को  चन्द  दिनों  में  ही शहर करती है .
पूछते हो के ये रातों की सियाही का सबब?
रात अंगारों के बिस्तर पे सफ़र करती है।

न  समझना  कि  तुझे  देखता नहीं कोई ,
ये  हवाएं  तेरी  हरकत  की खबर करती है .
तोड़ कर दम  ये "दामिनी" ने कहा है यारों,
नार बस यूँ ही जिंदगी में सफ़र करती है 
बढ़ रही तेजी से आबादी की रफ़्तार अवि',
चौड़ी नदियों को शहर की वो नहर करती है।

जिंदगी जब भी तेरी सम्त सफ़र करती है 
राह मुश्किल है मगर राह गुज़र करती है 

बेटे लन्दन में हैं पेरिस में हैंबेचारी माँ 
जिंदगी फूस के छप्पर में बसर करती है 

माँ की ममता भी ज़माने में निराली ठहरी 
प्यार बच्चो को बहुत शाम-ओ-सहर करती है
 
एक मजलूम की वो आह सुनी है जबसे
 दर्द बनती है मेरे दिल पे असर करती है 

जिंदगी हिज्र के मौसम में न पूछो यारों
रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है

कट गयी मेरी ज़ुबां दिल है अभी सीने  में 
है क़लम हाथ में कुछ बात मगर करती है 

फ़ैल जाती है फ़जाओं में बहार सू  "नायाब"
बात घर से  कोई परवाज़ अगर करती है

मज़लूम=जिस पर जुल्म हुआ हो, हिज्र=वियोग, परवाज़=उड़ान

याद आवारा सी जेहन में सफर करती है
आह एहसास को फुरकत की नजर करती है  |1|

अश्क़ आसानी से अक्सर बहा नहीं करते
चोट गहरी है जुंबा दिल पे जहर करती है |2|

ज़िंदगी है कहाँ महफूज़ लड़कियों की यहाँ
रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है |3|

निराश जिंदगी मुश्किल में सदा रहती है
आस से राह भी  मुश्किल पे जफ़र करती है |4|
मौत से डर गया बुजदिल वो कहाता यारों
जिंदगी मौत के उस पार सफर करती है |5|

चाल बहके तो बदनाम चलन है साकी
जाम छलके बिना मदहोश नजर करती है | 6|

दूर सौ कोस से उसने जो हमें याद किया
खुजलियाँ पूरे तन बदन पे कहर करती है |7|

ज़ेहन=मष्तिष्क, फुरकत=वियोग, ज़फर=विजय

दिल को ज़ख्मी तो कभी चाक जिगर करती है।
मुझपे क्यूँ ज़ुल्म तेरी तीरे नज़र करती है॥

दिन तो कट जाता है दुनिया के झमेलों में मगर,
“रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है”॥

मौत के मुंह से निकल आता है अक्सर इंसान,
जब दुआ चाहने वालों की असर करती है॥

जब भी जाती है किसी और से मिलने जुलने,
दिल जलाने के लिए मुझको ख़बर करती है॥

हर तरफ दर्द है सन्नाटा है तनहाई है,
मुझको अब तेरी कमी ज़ेरो-ज़बर करती है॥

जब भी आती है वो चुपके से मेरे कमरे में,
मेरी अलसाई हुई शब को सहर करती है॥

कौन कहता है के तन्हा है सफ़र में “सूरज”
आज भी याद तेरी साथ सफ़र करती है॥

चाक=फटा, जेरो ज़बर=अस्त व्यस्त, शब्= रात, सहर=भोर

 Ashok Kumar Raktale 

 राह में वो चलती और फिकर करती है,

हैं वफादार कहाँ प्यार मगर करती है||

 

बुझ गई लौ जलती थी हर के सीने में,

मायूसी ही दिल में आज बसर करती है||

 

दोषियों पर सरकारें नरमी रक्खें तो,

कोई परवाह नही कुदरत सर करती हैं||

 

लाख शोले बुझते हो भ्रम से वादों से,

रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है||

 

छोडना ना जिद रण में उतरे  दीवानो,

दामिनी आज भी राहों में सफर करती है||

HAFIZ MASOOD MAHMUDABADI 

जिंदगी ऐसे भी दुनिया में बसर करती है 
वक़्त पड़ता है तो काँटों पे गुज़र करती है 


बात अखलास के लहजे में अगर की जाये 
सुनने वाले पे यकीनन वो  असर करती है 


जिसकी फितरत में हुनर होता है हक गोई का 
उनकी हर बात दिलों ज़हन में घर करती है 


माना बदनामें ज़माना है बुराई  यारों 
अपने अंजाम से आगाह मगर करती है 


जिंदगी होती है गैरत में कभी जब मायूस 
रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है 


हमने असलाफ की तहजीब को छोड़ा तो मगर 
ये रविश रोज़ हमें जेरो ज़बर करती  है 


ऐसा लगता है मुनाफिक की है ये चाल कोई 
जो मेरे अज़्म से दुश्मन को खबर करती है 


ख्वाहिशें जर में तो बेटा गया परदेस मगर 
माँ से पूछे कोई किस तरह गुज़र करती है


फ़िक्र अहसास के दरिया में उतर कर "मसऊद"
एक बे नाम से कतरे को गुहर करती है  

असलाफ़= बुजुर्ग, पुराना ; रविश=आचरण, मुनाफिक=जिस के मुंह पर कुछ और हो और मन में कुछ और  

जिंदगी याद तुझे शाम ओ सहर  करती है 
चश्मे पुरनम मेरे दामन को जो तर करती है 

क्या कहूँ कैसे गुज़रती है शबे तन्हाई 
रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है

मैंने देखा है सितम  तेरी नज़र का जानाँ 
मेरे दिल को ये बहुत जीरो ज़बर करती है 

देख पहुंची है कहाँ तक ये बशर की हस्ती 
आज कल चाँद सितारों का सफ़र  करती है 

तेरी फुरक़त में मुझे ज़ख्म मिले हैं क्या क्या
आज भी याद तेरी चाक  जिगर करती है

दिल कभी उसका दुखे कुछ भी न ऐसा  करना 
हर दुआ माँ की बहरहाल असर करती है 

रूठ कर मुझ से "शफ़ाअत" वह किधर जायेगा 
उस की हर आह मेरे दिल पे असर  करती है

चश्मे पुरनम=भीगी हुई आँख, शबे तन्हाई-अकेलेपन की रात, जेरो ज़बर=अस्त व्यस्त, बशर=मनुष्य, फुरकत=वियोग

SANDEEP KUMAR PATEL
जिन्दगी जिनकी अमा में ही सफ़र करती है
उनकी राहों में अना रोज ग़दर करती है

चाहता कौन है औलाद नफ़र हो मेरी
भूख जालिम है जो बच्चों को नफ़र करती है

डोर के घिसने से पत्थर पे निशाँ पड़ते हैं
उसकी कोशिश है ये कोशिश तो असर करती है

दूर होती है तो मुश्किल से कटे इक पल भी
साथ बैठे तो वो सदियों को पहर करती है

माँ मेरी दूर से भी मुझको दुआएं देकर
गर्दिशें फूंक कर रातों को सहर करती है

जिसके अपने ही दगाबाज हुए हों उनकी
रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है

"दीप" मजलूम दुआ दे तो मिटे गम पल में
बद-दुआ उसकी ही पल भर में कहर करती है

अमा=गुमराही, कुमार्ग, अना=घमंड, नफ़र=मजदूर
संदीप पटेल "दीप"

 

SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" 

जब वो शरमा के मेरी सिम्त नज़र करती है,
उसकी प्यारी सी अदा दिल पे असर करती है |

नींद उसको भी नहीं आती मेरी फ़ुर्क़त में,
रात अंगारों के बिस्तर पे बसर करती है |

इस ज़माने का उसे डर तो बहुत हे लेकिन,
मुझको पाने का वो अरमान मगर करती है |

दूर तुझसे मैं चला जाऊं कहीं भी लेकिन,
ये तेरी याद मेरी साथ सफ़र करती है |

मेरी तस्वीर वो सीने से लगाकर हसरत,
मेरे जीने की दुआ शामो सहर करती है |

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राणाभाई, आपकी मेहनत इस बार विशेष रंग लायी है. मिसरों को कसौटी के संदर्भ में व्यक्त करने के साथ-साथ अप्रचलित शब्दों के मायने भी आपने दिये हैं. इस हेतु हार्दिक धन्यवाद.

आगे के आयोजनों में सभी प्रतिभागियों से यह अपेक्षा रहेगी कि अपनी ग़ज़लों में प्रयुक्त अप्रचलित शब्दों के अर्थ स्वयं दे दिया करें ताकि पाठक ग़ज़ल (रचना) का भरपूर आनन्द ले सकें.

सद्यः समाप्त मुशायरे की सभी ग़ज़लों को एक जगह संकलित करने के लिए आपका पुनः धन्यवाद और हार्दिक बधाई.

दूर होती है तो मुश्किल से कटे इक पल भी
साथ बैठे तो वो सदियों को पहर करती है

माँ मेरी दूर से भी मुझको दुआएं देकर
गर्दिशें फूंक कर रातों को सहर करती है

वाह वाह 

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