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Ajay Agyat
  • Male
  • Faridabad, Haryana
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Welcome, Ajay Agyat!

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faridabad
Native Place
delhi
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poetry my intt

ग़ज़ल

हँसते हँसते आज विदाई देता है 
बूढ़ी माँ को कौन दवाई देता है ...
पागल कर डाला है इस बीमारी ने 
सन्नाटों में शोर सुनाई देता है ..
जब भी तेरी आँखों में आँखें डालूँ 
मुझ को मेरा अक्स दिखाई देता है.. 
तेरी ज़ुल्फों की खुशबू के क्या कहने 
गुलशन का हर फूल दुहाई देता है ....
जलता है शब भर जो दीपक, उस को खुद 
सूरज आ कर ढेर बधाई देता है ....

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ग़ज़ल

ग़ज़ल के 4 अशआर 

सन्नाटों पर खूब सितम बरपाती है
मेरे भीतर तन्हाई चिल्लाती है
संकल्पों के मन्त्र मैं जब भी जपता हूँ
मंज़िल मेरे और निकट आ जाती है
पूरी क्षमता से जब काम नहीं करता
मेरी किस्मत भी मुझ पर झल्लाती है
हर पल तुझ को याद किया करता हूँ मैं
याद विरह के दंशों को सहलाती है

मौलिक व अप्रकाशित .... 

Posted on November 30, 2014 at 5:23pm — 9 Comments

ग़ज़ल

बचो इस से कि ये आफत बुरी है
नशा कैसा भी हो आदत बुरी है


पतन की ओर गर जाने लगे हो
यकीनन आपकी संगत बुरी है


कि सिगरेट मदिरा गुटका या कि खैनी
किसी भी चीज़ की चाहत बुरी है


हमें मालूम है मरना है इक दिन
मगर इस मौत की दहशत बुरी है


कमाया है जिसे इज्ज़त गँवा कर 
अजय अज्ञात वो दौलत बुरी है

मौलिक व अप्रकाशित 

Posted on October 15, 2014 at 5:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल

अंधेरों को मिटाने का इरादा हम भी रखते हैं

कि हम जुगनू हैं थोडा सा उजाला हम भी रखते हैं

अगर मौका मिला हमको ज़माने को दिखा देंगे

हवा का रुख बदलने का कलेज़ा हम भी रखते हैं 

हमेशा खामियां ही मत दिखाओ आइना बन कर

सुनो अच्छाइयों का इक खज़ाना हम भी रखते हैं



महकती है फिजायें भी चहक़ते हैं परिंदे भी

कि अपने घर में छोटा सा बगीचा हम भी रखते…

Continue

Posted on August 5, 2014 at 7:00am — 11 Comments

ग़ज़ल

मालूम है कि सांप पिटारे में बंद है
फिर भी वॊ डर रहा है क्यूँ कि अक्लमंद है

.

ये रंग रूप, नखरे,अदा तौरे गुफ्तगू
तेरी हरेक बात ही मुझको पसंद है

.

ये दिल भी एक लय में धड़कता है दोस्तो
सांसो का आना जाना भी क्या खूब छंद है

.

सोचा था चंद पल में ही छू लूँगा बाम को
पर हश्र ये है हाथ में टूटी कमंद है

.

दुश्वारियों से जूझते गुजरी है ज़िन्दगी
अज्ञात फिर भी हौसला अपना बुलंद है

.

मौलिक एवं अप्रकाशित.

Posted on August 1, 2014 at 8:30pm — 10 Comments

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