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ग़ज़ल के 4 अशआर 

सन्नाटों पर खूब सितम बरपाती है
मेरे भीतर तन्हाई चिल्लाती है
संकल्पों के मन्त्र मैं जब भी जपता हूँ
मंज़िल मेरे और निकट आ जाती है
पूरी क्षमता से जब काम नहीं करता
मेरी किस्मत भी मुझ पर झल्लाती है
हर पल तुझ को याद किया करता हूँ मैं
याद विरह के दंशों को सहलाती है

मौलिक व अप्रकाशित .... 

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 10, 2014 at 11:23am

अशआर बढ़िया और असरदार, लेकिन सिर्फ चार ? क्यों सरकार ?


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 2, 2014 at 10:11pm

आदरणीय अजय भाई , लाजवाब गज़ल कही , हार्दिक बधाई !

Comment by ram shiromani pathak on December 2, 2014 at 1:31pm

ज़ोरदार कहन आदरणीय //बहुत बधाई 

Comment by Hari Prakash Dubey on December 2, 2014 at 1:04pm

सुन्दर रचना पर आपको हार्दिक बधाई श्री अजय जी !

Comment by Abhinav Arun on December 2, 2014 at 7:35am

लाजवाब और पुरअसर ..बधाई आदरणीय !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 2, 2014 at 1:56am
शानदार अशआर ।
Comment by भुवन निस्तेज on December 1, 2014 at 5:09pm

संकल्पों के मन्त्र मैं जब भी जपता हूँ
मंज़िल मेरे और निकट आ जाती है

वाह आदरणीय, बहुत खूब....

Comment by Shyam Narain Verma on December 1, 2014 at 5:02pm

"बहुत खूब ,बहुत सुन्दर गजल"

Comment by somesh kumar on November 30, 2014 at 11:30pm

आप को पहली बार पढ़ रहा हूँ ,पर गज़ल की गहनता आप के हुनर और अनुभव को स्पष्ट चित्रित करती है 

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