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हौले-हौले बोल चिरैया, हौले-हौले बोल
पलने में कान्हा सोया है, तू मत इत-उत डोल
चिरैया हौले-हौले बोल...

पलकों पर सपने थिरके हैं, अधरों पर मुस्कान
चाँद हिण्डोला बन बैठा है, परियाँ देतीं तान
टूट न जाएँ मीठे सपनें, ये तो हैं अनमोल
चिरैया हौले-हौले बोल...

कच्ची निंदिया से जागा तो, होगा फिर बेचैन
रोएगा-चिल्लाएगा वो, मसल-मसल कर नैन
संग सभी बेचैन फिरेंगे, तू निंदिया मत खोल
चिरैया हौले-हौले बोल...

एक पहर के बाद लगाना, कान्हा को आवाज़
वरना खिड़की बंद रखूँगी, समझाती हूँ आज
मैं जाऊँ और तू आ जाए, अवसर रही टटोल
चिरैया हौले-हौले बोल...

ना भाएँगे बंदर-हाथी ना गुड़िया ना रेल
निंदिया में झूमेगा तब, कैसे पाएगा खेल
जग जाए, तू तब कर लेना जी भर यहाँ किलोल
चिरैया हौले-हौले बोल...

मौलिक और अप्रकाशित

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Replies to This Discussion

अत्यंत आत्मीय अभिव्यक्ति है ! हार्दिक बधाइयाँ !! 

sसादर धन्यवाद आदरणीय सौरभ जी 

वाह्ह्ह् सुन्दरम् आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी!

आत्मानुभूति कराती अनुपम बाल रचना के लिए हार्दिक बधाई डॉ. प्राची जी 

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