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डॉ.लक्ष्मी कान्त शर्मा
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Male
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राजस्थान
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जयपुर
Profession
प्राध्यापक
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हिंदी कवि ,पर्यावरणविद

डॉ.लक्ष्मी कान्त शर्मा's Blog

सिमट कर नहीं रहता / लक्ष्य “अंदाज़

सिमट कर नहीं रहता

~~~~~~~~~~~~~~~

(लक्ष्य “अंदाज़”)

वैसे भी मेरे घर की चिलमन में सिमट कर नहीं रहता !!

रंग नहीं खुशबू है वो मधुवन में सिमट कर नहीं रहता !!

गहरी आँखों के पानी में इक किश्ती कोई डूबी तो क्या ,

रूप का दरिया एक ही दरपन में सिमट कर नहीं रहता !!

कल जब वो उस जंगल से ज़ख़्मी हुए पाँव लिए लौटा ,

बोला ये बनफूल किसी चमन में सिमट कर नहीं रहता !!

गीली माटी की सौंध में लिपटे खस को क्या…

Continue

Posted on September 13, 2015 at 8:00pm — 3 Comments

बस इतनी सी मेहर रखना/लक्ष्य “अंदाज़

    बस इतनी सी मेहर रखना

  -------------------------------------

      (लक्ष्य “अंदाज़”)

हम फकीरों से घर की उम्मीद न इधर करना !

ढल जाये शाम तो दरख्त तले भी बसर करना !!

राहे-उल्फत में तुम हवा के परों पर सवार हो ,

अहले-ज़मीं हैं हम ,बस सड़क पे सफ़र करना !!

फूल मुहब्बत के तारीखे-शुआओं से जल गए ,

कोंपलों की आस में अब भी क्यूँ शज़र रखना !!

तुम्हारी हर दुआ कुबूल है उस इलाही के दर ,

दुआओं में याद रखना बस इतनी…

Continue

Posted on July 13, 2015 at 2:30pm — 4 Comments

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At 3:26pm on July 13, 2015, Aditya Kumar said…

swagat hai 

At 2:58pm on July 13, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…
ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में आपका हार्दिक स्वागत है।
 
 
 

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