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Nand Kumar Sanmukhani
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  • योगराज प्रभाकर
 

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Nand Kumar Sanmukhani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-100 (भाग -2)
"- ग़ज़ल छोड़कर वो चला गया है मुझे राह आसान सी बता गया है मुझे जंग दुनिया की जीत लूंगा मैं सब्र करना तो आ गया है मुझे मैने चाहा था कुछ भला करना ख़ूब तरक़ीब से छला गया है मुझे आश्वासन ही आश्वासन हैं दे के फिर झुनझुना गया है मुझे आ ही जाएगा शऊर पीने का…"
Oct 21, 2018
Nand Kumar Sanmukhani commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post ग़ज़ल (गणेश जी बागी)
"पांच बरस के बाद भी बेचारी जनता कहां कुछ बोल-समझ पाती है। कुर्सी के खिलाड़ी ऐसे-ऐसे स्वांग रचते हैं, ऐसे-ऐसे खेल तमाशे दिखाकर मतिभ्रम का वातावरण पैदा कर देते हैं कि कोई कुशल से कुशल अभिनेता भी क्या दिखा पाएगा। बेचारी भोली-भाली जनता इनके मदारीनुमा…"
May 22, 2018
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"वाह वाह खूब ग़ज़ल कही आदरणीय..सादर"
May 6, 2018
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"बहुत-बहुत शुक्रिया  आ. 'मुसाफ़िर' साहब.."
May 6, 2018
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"आ. नन्दकुमार जी, सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई ।"
May 6, 2018
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"जी, श्रीमान..."
May 5, 2018
Nilesh Shevgaonkar commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"आ. नन्द कुमार जी,मेरा  कतई आग्रह नहीं है कि आप  वो शेर शामिल करें...मैं सिर्फ़ यह इंगित कर रहा हूँ  कि बात कहने के तरीके और भी हैं... और उन्हीं शब्दों के आसपास हैं..बस कवि से हटकर पाठक बनकर सोचने की आवश्यकता है ..सादर "
May 5, 2018
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"आ. Samar Kabeer साहब, मुझे भी 'ही' की जगह 'तो' का इस्तेमाल ज़्यादा अपीलिंग लग रहा है, इस लिए मैं इस शइर में ये सुधार कर लेता हूं और  शइर को बेहतर बनाने में मेरी मदद करने के लिए आपका शुक्रिया अदा करता हूं।"
May 5, 2018
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"माननीय Nilesh Shevgaonkar जी, बधाई के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद । हर आदमी का अपनी बात कहने का अंदाज़ अपना-अपना होता है। वो अंदाज़ बहुत अच्छा है, या कम अच्छा है अथवा बिल्कुल भी अच्छा नहीं है, यह एक अलग बात है। सब लोग एक जैसा अच्छा या बुरा तो नहीं लिख…"
May 5, 2018
Nilesh Shevgaonkar commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"आ. नन्द कुमार जी अच्छी ग़ज़ल हुई है ,,बधाई ..शेरोन में लोच की थोड़ी कमी लग रही है ..उदाहरण  के लिए .नहीं ठीक है जो तुम्हारी नज़र मेंउसी की ही करते रहे हो वकालत.... इसे यूँ कहा जा सकता है ...ग़लत है तुम्हारी नज़र में भी लेकिन किये…"
May 5, 2018
Samar kabeer commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"भर्ती के शब्द से मुराद है, उसकी जगह कोई मज़बूत शब्द जैसे :- 'उसी की तो करते रहे हो वकालत' 'तो' शब्द यहाँ 'ही' की बनिस्बत मुनासिब है, यही मैं अर्ज़ करना चाहता था ।"
May 5, 2018
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"माननीय Samar Kabeer साहब, ग़ज़ल पसंद करने के लिए आपका तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूं। आपकी राय में जो 'ही' भर्ती का लगता है उसे हटा देने पर , वज़न की कमी के अलावा, मेरे विचार से बात का वो पैनापन ख़त्म हो जाता है, जो वहां मेरे विचार से होना…"
May 5, 2018
Samar kabeer commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"जनाब नंद कुमार जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें । 'उसी की ही करते रहे हो वकालत' इस मिसरे में 'ही' शब्द भर्ती का है ।"
May 5, 2018
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"बहुत-बहुत शुक्रिया आ. श्याम नारायण वर्मा जी.."
May 4, 2018
Shyam Narain Verma commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें ।"
May 4, 2018
Nand Kumar Sanmukhani's blog post was featured

ग़ज़ल

सोने की बरसात करेगासूरज जब इफ़रात करेगा बादल पानी बरसाएंगेराजा जब ख़ैरात करेगा जो पहले भी दोस्त नहीं थावो तो फिर से घात करेगा कुर्सी की चाहत में फिर वोगड़बड़ कुछ हालात करेगा जो संवेदनशील नहीं वोफिर घायल जज़्बात करेगा जो थोड़ा दीवाना है वोअक्सर हक़ की बात करेगा नंद कुमार सनमुखानी. - "मौलिक और अप्रकाशित"See More
May 4, 2018

Profile Information

Gender
Male
City State
BHOPAL
Native Place
JAIPUR
Profession
RETIRED FROM BANK
About me
Associated with Hindi, Urdu and Sindhi (my mother tongue) literature as reader and writer particularly with Ghazals and Nazms. Also appeared in various News Papers as a feature writer and Page Editor with Nav Bharat (all editions) related with presentation of "Translation of Representative Writings of Sindhi Literature on Monthly basis" for more than 18 months in 1991-92. Worked with All India Radio, Bhopal as Casual Announcer of Weekly Sindhi programme for a period of about 10 years from 1987. Looking after responsibility of Editor of yearly Literary Magazine of Sindhi Sahitya Academy, Madhya Pradesh Sanskriti Parishad,Bhopal.

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ग़ज़ल

(122 122 122 122)

करोगे कहां तक सबब की वज़ाहत
अंधेरों की कब तक करोगे इबादत

यक़ीं रख के सर को झुकाते रहे हो
दिखाते रहे हो ये कैसी शराफ़त

नहीं ठीक है जो तुम्हारी नज़र में
उसी की ही करते रहे हो वकालत

नई प्रेम नदियां बहा दो जहां में
यहां पर दिखाओ ज़रा सी सख़ावत

भले ख्वाब हों पर हक़ीक़त बनेंगे
मिटेगी यहां नफरतों की रिवायत

.

- नंद कुमार सनमुखानी

- मौलिक और अप्रकाशित

Posted on May 3, 2018 at 9:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल

लोकशाही क़माल है साहिब
लोक में ही बवाल है साहिब

काम इनके कभी नहीं रुकते
कौन इनका दलाल है साहिब

फिर से मिलने लगे हैं झुक झुक के
खेल करने का साल है साहिब

पूछने पर हमेशा कहते हैं
नेक सा ही ख़्याल है साहिब

अनगिनत हैं सवाल आंखों में
दिल में थोड़ा मलाल है साहिब

- -नंद कुमार सनमुखानी

"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on April 23, 2018 at 10:00am — 7 Comments

ग़ज़ल

सोने की बरसात करेगा
सूरज जब इफ़रात करेगा

बादल पानी बरसाएंगे
राजा जब ख़ैरात करेगा

जो पहले भी दोस्त नहीं था
वो तो फिर से घात करेगा

कुर्सी की चाहत में फिर वो
गड़बड़ कुछ हालात करेगा

जो संवेदनशील नहीं वो
फिर घायल जज़्बात करेगा

जो थोड़ा दीवाना है वो
अक्सर हक़ की बात करेगा

नंद कुमार सनमुखानी.
-
"मौलिक और अप्रकाशित"

Posted on April 23, 2018 at 10:00am — 21 Comments

ग़ज़ल

ख़ामोश रहें तो भी मुश्किल
कुछ बात कहें तो भी मुश्किल..

जो राज़ छुपे हैं सीने में
खुल जाएं तहें, तो भी मुश्किल..

वादा था किया ख़ुश रहने का
आंसूं जो बहें तो भी मुश्किल..

वो दर्द मुसलसल दें चाहे
हम दर्द सहें तो भी मुश्किल ..

विपरीत बहें हम धारों के
जो साथ बहें तो भी मुश्किल ..

- नंद कुमार सनमुखानी

"मौलिक और अप्रकाशित"

Posted on April 23, 2018 at 10:00am — 11 Comments

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At 7:29am on November 21, 2018, Ahmed Maris said…

Good Day,
How is everything with you, I picked interest on you after going through your short profile and deemed it necessary to write you immediately. I have something very vital to disclose to you, but I found it difficult to express myself here, since it's a public site.Could you please get back to me on:( mrsstellakhalil5888@gmail.com ) for the full details.

Have a nice day
Thanks God bless.
Stella.

 
 
 

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