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Nand Kumar Sanmukhani
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  • योगराज प्रभाकर
 

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Samar kabeer commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"'वो पहले भी दोस्त नहीं था' इस मिसरे को बदलने का प्रयास करें ।"
yesterday
Nilesh Shevgaonkar commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय नंद कुमार जी, एक ग़ज़लकार होने के नाते मैं भी इसी दुविधा से दोचार होता हूँ। मुझे लगता है कि मैंने जो कहना चाहा है वही पाठक ने भी समझा है। अस्ल में हमारा अवचेतन मन उस विचार में इतना गुँथ जाता है कि उस का कोई भी प्रकटीकरण हमें परिपुर्ण लगने लगता…"
yesterday
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Nilesh Shevgaonkar जी, सादर नमस्कार । मेरे ग़ज़ल के बारे में आपका जो भी मत बना है, उसका मैं सम्मान  करता हूं। मैने भी बात निकलने पर उसके  संबंध में केवल अपनी बात रखने का प्यत्न किया है, जिसका कि आप भी मानेंगे कि मुझे भी हक़…"
yesterday
Nilesh Shevgaonkar commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"अच्छी ग़ज़ल हुई है आ. नन्द कुमार जी बधाई ..तीसरे शेर में ऊला और सानी में रब्त कम लग रहा है .. झुकने और खेल करने में कोई सम्बन्ध नहीं मिल पा रहा है ..अंतिम शेर अच्छा बन पडा है..बधाई "
yesterday
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"जी, बहुत बहुत शुक्रिया आपका ।पढ़ते-सुनते थोड़ा गुनते क़वाफ़ी के मुआमलात भी धीरे-धीरे ज़हन नशीन हो जाएंगे। मंच पर पोस्ट की गई रचनाओं को पढ़कर 'अपनी अमूल्य टिप्पणियों से नवाज़ने' की बात पर पूरे अदब-ओ-एहतराम से  कहना चाहता हूं कि मुझे…"
yesterday
Nilesh Shevgaonkar commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"आ. नंदकुमार जी.आपकी टिप्पणी का अंश यहाँ उधृत कर रहा हूँ ..//दूसरा, आदरणीय नीलेश जी की टिप्पणी यदि मज़कूर शइर की मिसरा-अव्वल पर आधारित मानकर पढ़ें तो शतप्रतिशत सही है, लेकिन इसी शइर के सानी-मिसिरे में जो आया है कि 'वो तो "फिर से" घात…"
yesterday
Samar kabeer commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"चूँकि ग़ज़ल फ़ारसी विधा है इसलिए उसे उसी के मानकों पर तोलना होगा,उर्दू के हरुफ़-ए-तहज्जी और हिन्दी की वर्णमाला में बड़ा फ़र्क़ है, हिन्दी में 'तोय'अक्षर का कोई वजूद नहीं लेकिन उर्दू में है,इसलिये लाज़िम है कि ग़ज़ल कहने से पहले उर्दू का थोड़ा ज्ञान…"
yesterday
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"जनाब Tasdiq Ahmed Khan साहब, मशकूर हूं कि आपने ग़ज़ल पर अपनी राय देकर मेरी हौसला अफ़ज़ाई की है। मेहरबानी आपकी..."
yesterday
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"जनाब Samar Kabeer साहिब, आपकी टिप्पणी को मैने ध्यान से नहीं पढ़ा, ऐसी बात नहीं है। सवाल और भी आए थे ज़हन में, लेकिन एक साथ बहुत सारे सवाल पूछने की तुलना में मैने वो सवाल आपके सामने रखना वाजिब समझा,जिनके बारे में सबसे पहले जान लेने की इच्छा मन में…"
Tuesday
Tasdiq Ahmed Khan commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"जनाब नंद कुमार सन मुखानी साहिब , गज़ल का प्रयास अच्छा है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें। आ. समर साहिब के मश्वरे पर गौर करें ।"
Tuesday
Tasdiq Ahmed Khan commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"जनाब नन्द सन मुखानी साहिब ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें।"
Tuesday
Samar kabeer commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"ऐब-ए-तनाफ़ुर उस दोष को कहते हैं,जब किसी शब्द का अंतिम अक्षर उसके बाद आने वाले शब्द के पहले अक्षर समान हों जैसे आपके मतले के सानी मिसरे में 'सूरज जब',इसमें सूरज शब्द का अंतिम अक्षर "ज"है और उसके बाद के शब्द "जब" का पहला…"
Tuesday
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"आली जनाब Samar Kabeer साहिब आदिब। सबसे पहले तो ग़ज़ल पर आपके द्वारा दी गई दाद और मुबारकबाद के लिए दिल से आपका शुक्रिया अदा करता हूं। दूसरे, आपने ग़ज़ल पर कमेंट्स करते हुए "ऐब-ए-तनाफुर" और "तक़ाबुल-ए-रदीफ" टर्म्स का इस्तेमाल किया…"
Tuesday
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"आली जनाब Samar Kabeer साहब, ग़ज़ल कहने के इल्म से अभी मैं पूरी तरह वाक़िफ़ नहीं हूं। अभी तो इस राह पर मैने चलना शुरू ही किया है। इस लिए ग़ज़ल को ख़ूबसूरत कैसे बनाया जाता है, इसके लिए कौन-कौन से तरीक़े इख़्तियार किये जाते हैं आदि जैसी बातों से लगभग…"
Tuesday
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"जनाब Samar Kabeer साहब, आदाब अर्ज़ है। आपको मेरी छोटी सी कोशिश पसंद आई, यह मेरे लिए इंतहाई ख़ुशी की बात है। तहेदिल से आपका शुक्रगुज़ार हूं।"
Tuesday
Samar kabeer commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"जनाब नंद कुमार साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें । पूरी ग़ज़ल में सारा बोझ क़वाफ़ी पर है, जबकि ग़ज़ल की ख़ूबी इसे कहते हैं कि क़वाफ़ी पर बोझ न हो ।"
Tuesday

Profile Information

Gender
Male
City State
BHOPAL
Native Place
JAIPUR
Profession
RETIRED FROM BANK
About me
Associated with Hindi, Urdu and Sindhi (my mother tongue) literature as reader and writer particularly with Ghazals and Nazms. Also appeared in various News Papers as a feature writer and Page Editor with Nav Bharat (all editions) related with presentation of "Translation of Representative Writings of Sindhi Literature on Monthly basis" for more than 18 months in 1991-92. Worked with All India Radio, Bhopal as Casual Announcer of Weekly Sindhi programme for a period of about 10 years from 1987. Looking after responsibility of Editor of yearly Literary Magazine of Sindhi Sahitya Academy, Madhya Pradesh Sanskriti Parishad,Bhopal.

Nand Kumar Sanmukhani's Blog

ग़ज़ल

लोकशाही क़माल है साहिब
लोक में ही बवाल है साहिब

काम इनके कभी नहीं रुकते
कौन इनका दलाल है साहिब

फिर से मिलने लगे हैं झुक झुक के
खेल करने का साल है साहिब

पूछने पर हमेशा कहते हैं
नेक सा ही ख़्याल है साहिब

अनगिनत हैं सवाल आंखों में
दिल में थोड़ा मलाल है साहिब

- -नंद कुमार सनमुखानी

"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on April 23, 2018 at 10:00am — 6 Comments

ग़ज़ल

सोने की बरसात करेगा
सूरज जब इफ़रात करेगा

बादल पानी बरसाएंगे
राजा जब ख़ैरात करेगा

जो पहले भी दोस्त नहीं था
वो तो फिर से घात करेगा

कुर्सी की चाहत में फिर वो
गड़बड़ कुछ हालात करेगा

जो संवेदनशील नहीं वो
फिर घायल जज़्बात करेगा

जो थोड़ा दीवाना है वो
अक्सर हक़ की बात करेगा

नंद कुमार सनमुखानी.
-
"मौलिक और अप्रकाशित"

Posted on April 23, 2018 at 10:00am — 20 Comments

ग़ज़ल

ख़ामोश रहें तो भी मुश्किल
कुछ बात कहें तो भी मुश्किल..

जो राज़ छुपे हैं सीने में
खुल जाएं तहें, तो भी मुश्किल..

वादा था किया ख़ुश रहने का
आंसूं जो बहें तो भी मुश्किल..

वो दर्द मुसलसल दें चाहे
हम दर्द सहें तो भी मुश्किल ..

विपरीत बहें हम धारों के
जो साथ बहें तो भी मुश्किल ..

- नंद कुमार सनमुखानी

"मौलिक और अप्रकाशित"

Posted on April 23, 2018 at 10:00am — 7 Comments

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