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Rachna Bhatia
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अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल
"मुहतरमा रचना भाटिया जी, आदाब। आपने बताया है कि 'निर्मल' तख़ल्लुस आपको बेहतर लग रहा है, मगर ग़ौर करें कि 'निर्मल' शब्द पुल्लिंग है। आप चाहें तो अपने नाम 'रचना' को भी अपना तख़ल्लुस रख सकती हैं, या जो भी आपको बेहतर लगे।…"
Jun 10
Rachna Bhatia posted a blog post

ग़ज़ल

2122 2122 212.जो तुम्हारा है हमारा क्यों नहीं ये किसी ने भी बताया क्यों नहीं शह्र से मज़दूर आए गांव क्यों वक़्त पर उनको सँम्हाला क्यों नहीं लाख तारे आसमाँ पर थे मगर इक भी मेरी छत पे आया क्यों नहीं ख़्वाहिशों की भीड़ से ही पूछ लो मुझको इक पल का सहारा क्यों नहीं ज़िन्दगी भी दे रही ता'ना हमें लफ़्ज़ खु़शियों का लिखाया क्यों नहीं हारते हैं ग़म से "निर्मल" रोज़ ही जीतना हमको सिखाया क्यों नहीं मौलिक व अप्रकाशितSee More
Jun 9
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अमीरुद्दीन ' अमीर ' जी ग़ज़ल तक आने तथा क़ीमती समय देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। "आसमाँ में तारे ..." इस्लाह के लिए धन्यवाद। जी निर्मल ही मेरा तख़ल्लुस है और रचना मेरा नाम है , इसलिए मुझे निर्मल ही बेहतर लग रहा है। आदरणीय…"
Jun 9
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल
"मुहतरमा रचना भाटिया जी, आदाब। ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें।  "लाख तारे आसमाँ पर थे मगर          तारे आसमाँ पर नहीं आसमाँ में होते हैं। इसलिए चाहें तो  इक भी मेरी छत पे आया क्यों नहीं. …"
Jun 8
Rachna Bhatia posted a blog post

ग़ज़ल

2122 2122 212.जो तुम्हारा है हमारा क्यों नहीं ये किसी ने भी बताया क्यों नहीं शह्र से मज़दूर आए गांव क्यों वक़्त पर उनको सँम्हाला क्यों नहीं लाख तारे आसमाँ पर थे मगर इक भी मेरी छत पे आया क्यों नहीं ख़्वाहिशों की भीड़ से ही पूछ लो मुझको इक पल का सहारा क्यों नहीं ज़िन्दगी भी दे रही ता'ना हमें लफ़्ज़ खु़शियों का लिखाया क्यों नहीं हारते हैं ग़म से "निर्मल" रोज़ ही जीतना हमको सिखाया क्यों नहीं मौलिक व अप्रकाशितSee More
Jun 7
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-119
"आदरणीय सर, जी । मैं इसे ही ढूंढ रही थी।गलत जगह पर आपसे और राजेश कुमारी जी से क्षमा चाहती हूँ। सादर।"
May 23
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-119
"आदरणीय समर कबीर सर,आदाब। सर ग़ज़ल तक आने तथा मेरा हौसला बढ़ाने के लिए आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ।  बेहद शुक्रिया सादर।"
May 23
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-119
"आदरणीय सर, बहुत अच्छी इस्लाह ,बहुत बहुत शुक्रिया। सादर"
May 23
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-119
"आदरणीय दयाराम मैठानी जी हौसला बढ़ाने के लिए बेहद शुक्रिया।"
May 23
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-119
"आदरणीय अमित कुमार'अमित' जी,उत्साह बढ़ाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।"
May 23
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-119
"आदरणीय मोहन बेगोवाल जी,मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।"
May 23
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-119
"आदरणीया राजेश कुमारी जी, आपको मेरी कोशिश पसंद आई। बहुत बहुत धन्यवाद।"
May 23
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-119
"आदरणीय समर कबीर सर आदाब,सर हौसला अफज़ाई के लिए आपकी बहुत आभारी हूँ।सर क्या ऐसा कर सकते हैं "भगवान से जुदा भी दिखाना बहुत हुआ " सादर"
May 23
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-119
"221    2121   1221     212                       1 बस अब ख़ुदा को बीच में लाना बहुत हुआ  उसका ले नाम कुफ़्र भी ढाना बहुत हुआ                      2 मैं पूछता हूं तुझसे, तू मुझको हिसाब दे क्यों मेरे दिल में ग़म का ठिकाना बहुत…"
May 23
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-119
"आदरणीय अमीरुद्दीन ख़ान ' अमीर ' जी बहुत लाजवाब ग़ज़ल हुई बधाई स्वीकार करें।"
May 23
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-119
"आदरणीय दयाराम मैठानी जी तरही मिसरे पर बेहतरीन ग़ज़ल हुई बधाई स्वीकार करें।"
May 22

Profile Information

Gender
Female
City State
Delhi
Native Place
Delhi
Profession
Teacher
About me
nothing special... just start my journey ....

Rachna Bhatia's Blog

ग़ज़ल

2122 2122 212

.

जो तुम्हारा है हमारा क्यों नहीं

ये किसी ने भी बताया क्यों नहीं



शह्र से मज़दूर आए गांव क्यों

वक़्त पर उनको सँम्हाला क्यों नहीं



लाख तारे आसमाँ पर थे मगर

इक भी मेरी छत पे आया क्यों नहीं



ख़्वाहिशों की भीड़ से ही पूछ लो

मुझको इक पल का सहारा क्यों नहीं



ज़िन्दगी भी दे रही ता'ना हमें

लफ़्ज़ खु़शियों का लिखाया क्यों नहीं



हारते हैं ग़म से "निर्मल" रोज़ ही

जीतना हमको सिखाया क्यों नहीं…



Continue

Posted on June 6, 2020 at 9:00pm — 3 Comments

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

1

गर्म अफ़वाहों का बाज़ार ख़ुदा ख़ैर करे

बिक रहा झूठ का अख़बार ख़ुदा ख़ैर करे

2

चार सिक्कों की ख़नक जेब में क्या होने लगी

हो गए हम भी तलबगार ख़ुदा ख़ैर करे

3

शांत लहरों में भी कश़्ती को सहारा न मिला

डूबी मँझधार में पतवार ख़ुदा ख़ैर करे

4

इश़्क था या कि अज़ीयत ओ फ़ज़ीहत का सफर

है अलम दिल का पुर आज़ार ख़ुदा ख़ैर करे



बाँध रक्खा है किनारों ने संमदर ऐसे

रुक गई लहरों की रफ़्तार ख़ुदा ख़ैर… Continue

Posted on April 2, 2020 at 1:31pm — 4 Comments

ग़ज़ल

212 1212 1212 1212



सिर पे पांव रख हमारे,चढ़ रहे हो सीढ़ियाँ

फैंक दलदलों में यार,मांगते हो माफियाँ



जिंदगी में देख लीं,बहुत सी हमने आंधियाँ

खत्म हो चुके हैं अश्क,बंद सी हैं सिस्कियाँ



दास्ताने जिंदगी, सुना सके न हम कभी

दर खुदा के आ खड़े,ले चंद हम भी अर्जि़याँ



छा रही है तीरगी,न रोशनी दिखे कहीं

मौत है बुला रही,दे जिंदगी भी धमकियाँ



चापलूसी बोलती,न महनतों का मोल है

लग रही जगह जगह, इमान की ही बोलियाँ



साथ छोड़ चल… Continue

Posted on June 10, 2019 at 7:55pm — 5 Comments

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