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Zohaib
  • Male
  • Amroha, Uttar Pradesh
  • India
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Zohaib's Page

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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Zohaib's blog post ग़ज़ल (सुन कर ये तिरी ज़ुल्फ़ के मुबहम से फ़साने)
"आ. जोहेब जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
Oct 24, 2018
Nilesh Shevgaonkar commented on Zohaib's blog post ग़ज़ल (सुन कर ये तिरी ज़ुल्फ़ के मुबहम से फ़साने)
"आ. ज़ोहेब जी,अच्छी ग़ज़ल है ..दीवाने को दिवाना  पढना दोषपूर्ण है .. मतला बदल लीजिये सादर "
Oct 24, 2018
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Zohaib's blog post ग़ज़ल (ज़ख्म सारे दर्द बन कर)
"वाह बढ़िया ग़ज़ल ज़नाब जोहैब जी..तीसरे शेर में रदीफ़ेन दोष है क्या?"
Oct 23, 2018
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Zohaib's blog post ग़ज़ल (सुन कर ये तिरी ज़ुल्फ़ के मुबहम से फ़साने)
"वाह बहुत ही खूब ग़ज़ल हुई है ज़नाब..मुबारक़"
Oct 23, 2018
Zohaib posted blog posts
Oct 22, 2018
Samar kabeer commented on Zohaib's blog post किस कि सुनता है (ग़ज़ल)
"जनाब ज़ोहेब साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई । मतले के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,देखियेगा । कुछ अशआर शिल्प की दृष्टि से कमज़ोर हैं,प्रयासरत रहें,धीरे धीरे आप इसपर क़ाबू पा लेंगे,अध्यन भी आवश्यक है ।"
Sep 13, 2018
Zohaib posted a blog post

किस कि सुनता है (ग़ज़ल)

किसकी सुनता है मन की करता है,मुँह में रखता ज़बान-ए-गोया है..हक़ बयानी ही उसका शेवा है, कब उसे ज़िन्दगी की परवा है..मौत पर ये जवाब उसका है, क्या अजब है कि इक तमाशा है..वो जो हर ग़म में इक मसीहा है, कौन जाने कहाँ वो रहता है..क्यूँ ख़्यालों में है अबस मेरे किस ने ज़ोहेब उसको देखा है..??मौलिक एवं अप्रकाशित।See More
Sep 11, 2018
Samar kabeer commented on Zohaib's blog post ग़ज़ल (हर धड़कन पर इक आहट)
"जनाब ज़ोहेब साहिब आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 27, 2018
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Zohaib's blog post ग़ज़ल (हर धड़कन पर इक आहट)
"क्या कहने.....हार्दिक बधाई।"
Aug 27, 2018
Sheikh Shahzad Usmani commented on Zohaib's blog post ग़ज़ल (हर धड़कन पर इक आहट)
"वाह। बहुत बढ़िया पेशकश। हार्दिक बधाई ज़ोहैब साहिब।"
Aug 26, 2018
Zohaib posted blog posts
Aug 26, 2018
Zohaib posted blog posts
Aug 4, 2018
Zohaib commented on Zohaib's blog post ग़ज़ल
"बहुत बहुत शुक्रिया जनाब समर कबीर साहब, ऐसे ही कर लिया जायेगा।"
Aug 3, 2018
Samar kabeer commented on Zohaib's blog post ग़ज़ल
"//लिये ख़ंजर वो मेरी ताक में हैं// इस मिसरे को यूँ कर लें ऐब निकल जायेगा:- 'लिये ख़ंजर वो देखो ताक में है' //दिखावे की मुहब्बत थी सभी की// इस मिसरे को यूँ कर लें,ऐब निकल जायेगा :  'सभी की थी दिखावे की महब्बत' //जहाँ पर…"
Aug 3, 2018
Dr Ashutosh Mishra commented on Zohaib's blog post ग़ज़ल
"भाई जोहेब जी इस प्रयास के लिए हार्दिक बधाई ...सादर "
Aug 3, 2018
Zohaib commented on Zohaib's blog post ग़ज़ल
"मोहतरम जनाब समर कबीर जी इस्लाह के लिये बेहद मशकूर ओ ममनून हूँ, दरअसल मैं शायरी के अलिफ बे से वाकिफ नही बस शौकिया कुछ कहने की कोशिश करता रहता हूँ और गुनगुना कर देख लेता हूँ कि अटक तो नहीं आ रही। इसके अलावा अब ग़ज़ल की बारीकियां फोरम पर पढ़नी शुरू की हैं…"
Aug 3, 2018

Profile Information

Gender
Male
City State
Amroha U.P.
Native Place
Amroha
Profession
Unamploid

Zohaib's Blog

ग़ज़ल (ज़ख्म सारे दर्द बन कर)

दर्द सारे ज़ख्म बन कर ख़ुद-नुमा हो ही गये,

राज़-ए-पोशीदा थे आख़िर बरमला हो ही गये..

तू ना समझेगा हमें थी कौन सी मजबूरियाँ,

तेरी नज़रों में तो अब हम बे-वफ़ा हो ही गये..

इश्क़ क्या है, क्या हवस है और क्या है नफ़्स ये,

उठते उठते ये सवाल अब मुद्द'आ हो ही गये..

एक मुददत बाद उस का शहर में आना हुआ,

बे-वफ़ा को फिर से देखा औ फ़िदा हो ही गये..

फिर सुख़न में रंग आया उस ख़्याल-ए-ख़ास का,

फिर ग़ज़ल के शेर सारे मरसिया हो ही…

Continue

Posted on October 21, 2018 at 2:45am — 1 Comment

ग़ज़ल (सुन कर ये तिरी ज़ुल्फ़ के मुबहम से फ़साने)

सुन कर ये तिरी ज़ुल्फ़ के मुबहम से फ़साने,

दश्ते जुनुं में फिरते हैं कितने ही दीवाने..

कब साथ दिया उसका दुआ ने या दवा ने,

आशिक़ को कहाँ मिलते हैं जीने के बहाने..

मुमकिन है तुम्हें दर्स मिले इनसे वफ़ा का,

पढ़ते कुँ नहीं तुम ये वफ़ाओं के फ़साने..

इस दौर के गीतों में नहीं कोई हरारत,

पुर-सोज़ जो नग़में हैं वो नग़में हैं पुराने..

इस इश्क़ मुहब्बत में फ़क़त उन की बदौलत,

ज़ोहेब तुम्हें मिल तो गये ग़म के…

Continue

Posted on October 21, 2018 at 2:30am — 3 Comments

किस कि सुनता है (ग़ज़ल)

किसकी सुनता है मन की करता है,

मुँह में रखता ज़बान-ए-गोया है..

हक़ बयानी ही उसका शेवा है,
कब उसे ज़िन्दगी की परवा है..

मौत पर ये जवाब उसका है,
क्या अजब है कि इक तमाशा है..

वो जो हर ग़म में इक मसीहा है,
कौन जाने कहाँ वो रहता है..

क्यूँ ख़्यालों में है अबस मेरे
किस ने ज़ोहेब उसको देखा है..??

मौलिक एवं अप्रकाशित।

Posted on September 11, 2018 at 10:30am — 1 Comment

ग़ज़ल (हर धड़कन पर इक आहट)

हर धड़कन पर इक आहट,
सोचूँ तो हो घबराहट..

यारों उससे पूंछो तो,
क्यूँ है मुझसे उकताहट..

लहजा उसका है शीरीं,
आँखें उसकी कड़वाहट..

मुझसे इतनी दूरी क्यूँ,
हर लम्हा है झुंझलाहट..

उससे हाले दिल कह कर,
देखी उसकी तिर्याहट..!!

मौलिक एवं अप्रकाशित।

Posted on August 25, 2018 at 8:31pm — 3 Comments

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At 8:07am on November 21, 2018, Ahmed Maris said…

Good Day,
How is everything with you, I picked interest on you after going through your short profile and deemed it necessary to write you immediately. I have something very vital to disclose to you, but I found it difficult to express myself here, since it's a public site.Could you please get back to me on:( mrsstellakhalil5888@gmail.com ) for the full details.

Have a nice day
Thanks God bless.
Stella.

 
 
 

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