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KALPANA BHATT ('रौनक़')'s Blog – April 2017 Archive (4)

छाँव

खेतों में चलते हैं

हल जब भी

पसीना बहता है

मिट्टी में घुल मिलकर

लहराती फ़सल की देता सौगात है



धूप की तपिश

बरसात होती वरदान

थके कदमों को

बड़े वृक्ष देतें हैं छाँव



कुदरत के बिना

जीना होगा असम्भव

फिर कैसा घमण्ड

कैसा गुरुर



ज़मीन सभी की

पेड़ सभी के

छोटे बड़ों की

क्या होतीं हैं पहचान ?



ज़मीन भी यहीं

आसमान भी

फिर यह कैसी सोच

कि किसी एक को

मिल रहा सरंक्षण आसमान का



जो नहीं… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 21, 2017 at 9:02am — 8 Comments

हाइकू

लगती प्यारी
मोहे मेरी बिटिया
गोरैया जैसी ।

रोज़ जगाती
नींद से हर दिन
प्यारी बिटिया ।

ठुमक कर
चलती थी नन्हीं सी
मेरी बिटिया ।

बड़ी सयानी
मीठी जिसकी बोली
मेरी बिटिया ।


घर आँगन
महकाती प्यार से
मेरी बिटिया ।

नया घरौंदा
बसाया अपना भी
मेरी बिटिया ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 7, 2017 at 4:30pm — 3 Comments

हाइकु

मौज मनाने
छुट्टियों में हैं आते
नदी किनारे

बड़ी सुहानी
हवा चलती यहाँ
नदी किनारे ।

मन मोहक
नज़ारा यहाँ होता
नदी किनारे ।

मस्त लहर
आकर टकराती
नदी किनारे ।

भीड़ अधिक
हो जाती है अक्सर
नदी किनारे ।

संग पिया के
सन्ध्या देखने आती
नदी किनारे ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 4, 2017 at 7:59pm — 1 Comment

मधुमालती छंद ( मात्रा विधान - 7-7 , 7-7)

शारदे माँ ( मधुमालती छंद)

माँ शारदे वरदान दो
सत बुद्धि दो संग ज्ञान दो
मन में नहीं अभिमान हों
अच्छे बुरे का सज्ञान दो

वाणी मधुर रसवान दो
मैं मैं का न गुणगान हों
तुमसे कभी हम दूर हों
न ऐसे कभी मज़बूर हों

दिल में सदा ही तुम रहो
रात और दिन बस तुम रहो
तुम बीन न यह जीवन हों
माँ शारदे ऐसा वर दो ।।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 4, 2017 at 7:06pm — 7 Comments

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